Havan | बिश्नोई समाज में हवन का महत्त्व

बिश्नोई समाज हवन का बहुत ही महत्व है, तथा समाज के लोगों को गुरु जांभोजी ने प्रतिदिन हवन करने को कहां है, प्रतिदिन हवन करने से वातावरण में शुद्धि बनी रहती है।

बिश्नोई समाज में हवन का महत्त्व

बिश्नोई पंथ में हवन का अत्यधिक महत्त्व है। समाज के प्रत्येक संस्कार पर हवन होता है। गुरु जाम्भोजी ने उनतीस नियमों में ‘नित्य हवन’ करने के नियम को सम्मिलित किया है। इसके साथ-साथ शब्दवाणी में भी हवन के महत्त्व को प्रकट किया है और हवन न करने को मनुष्य का बड़ा अपराध माना है।

बिश्नोई पंथ में गुरु जाम्भोजी के समय से ही हवन की प्रथा चली आ रही है। हवन के समय शब्दवाणी के सबदों का एक विशेष लय में पाठ किया जाता है। घरों में किये जाने वाले प्रतिदिन के हवन में शब्दवाणी के प्रारम्भिक पांच-सात सबदों का पाठ करके अन्त में ‘शुक्ल हंस’ सबद बोला जाता है।

हवन के सम्पूर्ण होने पर धूप मंत्र बोला जाता है। हवन के इस महत्त्व के पीछे एक कारण यह भी है कि पंथ में हवन की ज्योति में गुरु जाम्भोजी के दर्शन माने जाते है।

हवन का आधार केवल आध्यात्मिक नहीं है अपितु इसके साथ-साथ इसका आधार वैज्ञानिक भी है। आज विज्ञान ने भी हवन के महत्त्व को स्वीकार कर लिया है। पर्यावरण को शुद्ध रखने में भी हवन का सर्वाधिक योगदान है। हवन से प्रदूषण नष्ट हो जाता है और सम्पूर्ण वातावरण शुद्ध हो जाता है।

बिश्नोई पंथ में प्रतिदिन जो घरों में हवन होता है उससे घर का वातावरण शुद्ध रहता है और मन्दिरों में होने वाले सामूहिक हवन से समाज का वातावरण शुद्ध रहता है।

Havan

यह रावासर धाम जम्भ धोरा का दृश्य है, जहां प्रतिदिन हवन होता है इसी प्रकार बिश्नोई समाज में हर रोज हवन के साथ-साथ शब्दवाणी का पाठ एक लय में किया जाता है।

2 thoughts on “Havan | बिश्नोई समाज में हवन का महत्त्व”

  1. प्रिय भवेश मैंने bishnoisamaj.com पर आपका लेख “विश्नोई समाज में हवन का महत्व” पढ़ा ।आपने सराहनीय प्रयास किया है ।आप बधाई के पात्र हैं ।मैं ज़िला एवं सत्र न्यायाधीश के पद से साल 2011 में सेवानिवृत्त हुआ । मैं भी अपने समाज और पंथ में रुचि रखता हूँ । हमारे समाज में हवन करने की प्रथा तो है परन्तु तरीक़ा नहीं है । हम हिन्दू हैं ।हमारा समाज हिन्दू धर्म की एक शाखा है ।हमारे समाज के नियम , हिन्दू धर्म के नियमों पर आधारित हैं । हिन्दू धर्म के नियम पुराणों ,वेदों , गीता इत्यादि पर आधारित हैं ।जैसे ऋग्वेद, यजुर्वेद में यज्ञ और हवन करने की विधि दी गयी है । श्री गुरू जम्भेश्वर जी ने नित्य हवन ,सन्ध्या आदि करने के लिये कहा था । यह नहीं कहा था कि हवन या यज्ञ उपरोक्त वेदों में बताये गये मन्त्रों से नहीं करना । गुरू महाराज ने कहीं नहीं कहा कि हवन करते समय उनके द्वारा दिये गये 120 सबदों को गायन करके हवन की प्रक्रिया को सम्पन्न मान लें । वैसे भी श्री गुरू महाराज की “सबद-वाणी” तो उनके द्वारा समाज के लोगों को दिये गये ज्ञान व शिक्षाओं का ग्रंथ है ।इन ज्ञान की बातों को समझते हुए हमें जीवन व्यतीत करने करने के लिए कहा था । “सबद-वाणी” के काफ़ी सबद मुसलमानों के लिए कई “सबद” नाथ समुदाय के प्रति कहे गये थे ।उन “सबदों” को “जम्मा” “जागरण” में पढ़ने या गाने का क्या औचित्य है । वैसे भी पंथ की स्थापना के दिन तक तो सारे “सबद” श्री गुरू महाराज द्वारा कहे भी नहीं गये थे ।तो यह कहना कि “ सबद-वाणी” का उच्चारण करना ही हवन है ,निराधार है । यदि “सबद-वाणी” का उच्चारण करना ही हवन है तो इसका मतलब श्री गुरू महाराज की पूजा करना हुआ, परन्तु श्री गुरू महाराज ने तो मानव को केवल विष्णु का जप करने को कहा था ।श्री गुरू महाराज के प्रति श्रद्धा रखने का सही तरीक़ा उनकी शिक्षाओं का सही रूप में पालन करना है । हमारे समाज में कुरीतियाँ बढ़ रही हैं और इसका मुख्य कारण हमारे समाज में शिक्षा की कमी है । यज्ञ या हवन की प्रचलित प्रक्रिया तो हमारे समाज में पुराणों ,वेदों और अन्य शास्त्रों के ज्ञान के अभाव में अपनाई गयी प्रक्रिया हैं । यज्ञ और हवन में अग्निदेव व इन्द्र देव की उपासना की जाती है उनके आवाहन के लिये मन्त्र ऋग्वेद व यजुर्वेद में दिये गए हैं । कृपया समाज को हिन्दू धर्म की एक शाखा के रूप में आगे बढ़ाने का प्रयास करें ।

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