BishnoiSamaj शब्दवाणी के शब्द

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BishnoiSamaj शब्दवाणी के शब्द (हिन्दी)

    शब्द 1

    ओउम गुरु चीन्हों गुरु चिन्ह पुरोहीत, गुरु मुख धर्म बखाणी । जो गुरु होय वा सहज शीले शब्दे नादे वादे, तिहिं गुरु का अलिंकार पिछाणी । छ्व दरशण जिहिं कै रुपण थापण, संसार बरतण निज कर थरप्या, सो गुरु प्रत्यज्ञ जांणी । जिहिं कै खर तर गोठ निरोतर बाचा, रहिय रुद्र समाणी । गुरु आप संतोषी अवरांपोषी, तत्त्वमहा रसबाणि । के के अलियाबासण होत हुताशण तामै तीर दुहीजुं । रसुवन गोरस घीयन लीयुं, तहां दुध न पाणी । गुरु ध्याइ- येरे ज्ञानी । तोड्त मोहा अति षुरसांणी, छीजल लोहा । पाणी छ्ल तेरी खाल पखाला, सतगुरु तोडे मन का साला । सतगुरु है तो सहज पिछाणी, कॄष्ण चरित्र विन काचै करवै रह्यो न रहसी पाणी ।। 1 ।।

    शब्द 2

    ओउम मोरे छायान माया लोह न मांसु । रक्तुं न धातुं । मोरे माई न बापुं । रोही न रांपु । को न कलापुं । दुख; न सरापुं । लोंई अलोई । तयुंह त्रुलाइ । ऐसा न कोई । जपां भी सोई । जिहीं जपे आवागवण न होई । मोरी आद न जाणत । महियल धुं वा बखाणत । उरखडा- कले तॄसुलुं । आद अनाद तो हम रचीलो, हमे सिरजीलो सैकोण । म्हे जोगी कै भोगी कै अल्प अहारी । ज्ञानी कै ध्यानी, कै निज कर्म धारी । सौषी कै पोषी । कैजल बिंबधारी, दया धर्म थापले निज बाला ब्रह्मचारी ।। 2।।

    शब्द 3.

    ओउम मोरे अंगन आलसी तेल न मलियो । ना परमल पीसीयों । जीमत पीवत भोगत बिलसत । दीसां नाही म्हापण को आधारुं । अड्सठ तीरथ हिरदा भीतर, बाहर लोका चारुं । नान्हीं मोटी जीया जुंणी । एती सास फुरंते सारु । बासंदर क्युं एक भणिजैं । जिहिं कै पावन पिराणों । आलासुका मेल्है नाहीं । जिहीं दिश करै मुहाणों । पापे गुन्हे वीहै नाहीं । रीस करै रिसाणौं । बहुली दौरे लावण हारुं । भावै जाणुं न तु सुर नर । न तु शंकर । न तु रावन राणौं । काचै पिंड अकाज चलावैं, । अधुरत दाणौं । मोरै छुरी न धारु न लोह न सारु । न हथ्यारु सुरज को रिप बिहंडा नाही । तातै कहा उठावत भारु । जिहीं हाकणडी बलद जु हाकै, न लौहै की आरु ।। ३।।

    शब्द 4

    ओउम जद पवन न होता पाणी न होता । न होता गंग दर तारु । गउ न गोरु माया जा न होता । न होता हेत पियारुं । माय न बाप न बहण न भाई साषण सैण न होता । न होता पष परवारुं । लख चौरासी जीया जुणी न होति । न होति बणि अठारा भारुं । सप्तापताल फुंणीद न होता । न होता सागर खारु । अजिया सजिया जीया जुणी न होती बणी अठारा भांरु । न होती कुडी भारतारु । अर्थ न गर्थ न गर्व न होता । न होता तेजी तुरंत तुखारु । हाट पट्ण बाजार न होता । न होता राज दवारु । चाव न चहन न कोह्का बाण न होता । तद होता एक निरंजन शंभु, कै होता धंधुकारु । बात कदो की पुछै लोई । जुग छतीसु बिचारु ताह परैरे अवर छतीसुं । पहला अंत न पारु । म्हे तदपण होता अब पण आछै, बल २ होयसां कह कद कद का करुं विचारुं ।।४।।

    शब्द 5

    ओउम आइयालो अपरं बाणी । म्हे जपां न जाया जीऊं । नव अवतार नमोनारायण । तेपण रुप हमारा थींयुं । जपी तपी तक पीर ॠषेश्वर । काय जपीजे तेपण जाया जीऊं । खैचर भुचर षेत्रपाला परगट गुप्ता । काय जपीजे तेपण जाया जीऊं। बासग शेष गुलिन्दा फुलिन्दा । काय जपीजे तेपण जाया जीऊं । चौषट जोगिनी बावन बीरुं कांय जपिजै तेपण जाया जीऊं । जपां तो एक निरालंभ शंभु । जिहीं कै माई न पीऊं । न तन रक्तुं न तन धातु । न तान ताव न मुलज लेणा कीयों अइयोलो अपरंपार बाणी । म्हे जपां न याया जीऊं ।।५।।

    शब्द 6

    ओउम भवन २ म्हे एकाजोति । चुन २ लीया रतना मोति । म्हे खोजी थापण होजी नाही । खोज लहां धुरु खोजुं । अल्लाह अलेख अडाल अजोनी स्वयंभु । जिहिं का किसा बिनाणी म्हे सरै न बैठा सीखन पुछी । निरत सुरत सब जाणी । उतपती हिं जरणा जोगि । किरिया ब्राह्मण दिल दरवेसा उन मुन मुल्ला अकाल मिसलमानी ।।६।।

    शब्द 7

    ओउम हिंदु होय कै हर क्युं ना जंप्यो । कांय दहदिश दिल पसरायों । सोम अमावस आदितबारी । कांय काटी बनरायों । ग्रहण गहंतै । बहण बहंते । निर्जल ग्यारस मुल बहंते । कांयरे मुरखा तैं पामंग सेज निहाल बिछाई । जादिन तेरे होम न जापे न तप न किरिया । जान कै भागी कपिला गाई । कुडतणों जे करतब कीयो नातै लावनसायों । भुला प्राणी आल बखाणी । न जंप्यो सुररायों । छंदै कहां तो बहुता भावै। खरतर को पतियायों । हिव की बेलां हिव न जाग्यो । शंक रह्यो कदरायों । ठाढी बेला ठारन जाग्यो । ताती बैलां तायों । बिम्बै बेलां विष्णु न जंप्यो । ताछै का चीन्हों कछु कमायों । अति आलस भोला वै भुला । न चीन्हो सुररायों । पारब्रह्म की सुध न जाणीं । तो नागे जोग न पायो । परशुराम कें अर्थ न मुवा । ताकी निश्चै सरी न कायों ।।७।।

    शब्द 8

    ओउम सुणरै काजी सुणरै मुल्लां । सुणरै बकरकसाई । किणरी थरपी छाली रोसो किणरी गाडर गाई । सुल चुभीजै करक दुहेली तो है हैं जायो जीव न घाई । थे तुरकी छुरकी भिस्ती दावो खायबा खाज अखाजुं । चर फिर आवै सहज दुहावै तिसका खीर हलाली । जिसके गले करद क्यों सारो थेपढ सुण रहिया खाली ।।८।।

    शब्द 9

    ओउम दील साबत हजकोबा नेडै । क्या उलबंग पुकारो । भाई नाऊं बलद पियारो । ताकै गलै करद क्यों सारो । बिन चिन्हैं खुदाय बिबरजत । केहा मुसलमो । काफर मुकर होयकर राह गमायो । जोय २ गाफल करै धिगाणों । ज्युं थे पच्छिम दिशा उलबंग पुकारो । भलजे यों चीन्हों रहमाणों । तो रुह चलंतै पिणड पडंतै । आवे भिस्त बिमाणों । चढ २ भींते मडी मसीते । क्या उलबंग पुकारो । काहे काजै गऊ बिणासो । तो करीम गऊ क्युं चारी । काहे लीयों दुधुं दहियुं । काहे लीयों धियुं महियुं । काहे लीयुं हाडुं मासुं । काहे लीयुं रक्तुं रुहियुं । सण रे काजी सुणरे मुल्लां । यामै कोंण भया मुरदारुं । जीवा ऊपर जोर करीजै । अंतकाल ।।९।।

    शब्द 10

    ओउम बिसमिल्ला रहमान रहीम । जिहिंकै सदकै भीना भीन तो भेटीलो रहमान रहीम । करीम काया दिल करणी । कल्मा करतब कौल वुराणों । दिल खोजो दरबेस भईलो । तईया मुसलमाणों । पीरां पुरुषां जमी मुसल्लां । कर्तब लेक सलामों । हम दिल लिल्ला तुम दिल लिल्ला । रहम करै रहमाणों । ईतने मिसले चालो मीयां । तो पावो भिस्त इमाणों । इतने मिसले चालो मीयां । तो पावो भिस्त इमाणों ।।१०।।

    शब्द 11

    ओउम दील साबत हज काबो नेडै । क्या उलबंग पुकारो । सीने सरबर करो बंदगी । हक्क नमाज गुजारो । इंहि हेडै हरदीन की रोजी । तो इसही रोजी सारो । आप खुदाय बंद लेखो मांगे । रे बिनही गुन्हैं जीव क्युं मरो । थेतक जाणों तक पिड न जाणों । बिच परचे बाद नमाज गुजारो । चर फिर आवै सहज दुहावै । जिसका खीर हलाली । तिसके गले करद क्यों । सारो । थै पढ सुण रहिया खाली । थे चढ २ भिते मडी मसीते । क्या उलबंग पुकारो । कारण खोटा करतब हिणा । थारी खाली पडी नमाजुं । किहिं ओजु तुम धोवो आप । किहिं ओजु तुम खंडा पाप । किंहि ओजु तुम धरो ध्यान । किहीं ऑजु चिन्हों रहमान । रे मुल्ला मन माहिं मसीत नमाज गुजारिये । सुण्ता ना क्या खरै पुकारिये । अलख न लखियों । खलक पिछाण्यों । चांम कटे क्या हुइयों । हक्क हलाल पिछाणयों नाहीं । तो निश्चे गाफल दौरै दीयों ।।११।।

    शब्द 12

    ओउम महमद रन कर काजी । महमद का तो विषम विचारु । महमद हाथ करद जो होती लोहै घडी न सारु । महमद साथ पयंबर सीधा । एक लाख असी हजार । महमद मरद हलाली होता । तुम ही भए मुरदारु ।। १२ ।।

    शब्द 13

    ओउम कांयरे मुरखा तै जन्म गमायो । भुंय भारी ले भारु । जदिन तेरै होमनै जापनै तुपनै किरिया । गुरु न चीन्हों पंथ न पायों अहल गई जमबारु । तांती बेला ताव न जाग्यो । ठाढी बेला ठारु । बिबैं बैला विष्णु न जंप्यो । तातै बहुत भई कसवारु । खरी न खाटी देह बिणाठी । थीर न पावना पारु । अहनिश आव घटंती जावै । तेरे स्वास सबी कसवारु । जा जन मंत्र विष्णु न जप्यो । कांध सहै दुख भारुं । जा जन मंत्र विष्णु न जप्यो । तै घण तण अहारु । जा जन मंत्र विष्णु न जप्यो । ताको लोही मांस बिकारुं । जा जन मंत्र विष्णु न जप्यो । गांए गाडर सहरे सुवर जन्म २ अवतारु । जा जन मंत्र विष्णु न जप्यो । राने बासो मोनी बैसे, ढुके सुर सवांरु । जा जन मंत्र विष्णु न जप्यो । ते अचल उठावत भारु । जा जन मंत्र विष्णु न जप्यो । ते न उतारिबा पारुं । जा जन मंत्र विष्णु न जप्यो । ते नर दौरे घुपं अंधारु । तातैं तंत्र न मंत्र न जुडी न बुटी । उंडी पडी पहारु । विष्णु न दोष किसो रे प्राणी । तेरी करणी का उपकारुं ।।१३।।

    शब्द 14

    ओ3म मोरा उपख्यान वेदूं कण तत भेदूं । षास्त्रे पुस्तके लिखना न जाई ।। मेरा शब्द खोजो । ज्यूं षब्दे शब्द समाई ।। हिंरणा दोह क्यू हिरण हतोलूं । कृश्ण चरित बिन क्यू बाघ बिडारत गाई।। सुनही सुन हांका जाया । मुरडा बघेरी बघेरा न होयबा ।। कृश्ण चरित बिन सीचाण कबही न सुजीउं ।। खर का शब्द न मधुरी बाणी ।। कृश्ण चरित बिन, ष्वान न कबही पहीरू । मुंडी का जाया मुंडा न हीेयबा ।। कृश्ण चरित बिन, रीछां कबही न सुचीलूं ।। बिल्ल्ी की इन्द्री सन्तोश न होयबा । कृश्ण चरित बिन, काफरा न हीेयबा लीलू ।। मुरगी का जाया मोरा न हीेयबा । कृश्ण चरित बिन, भाकला न हीेयबा चीखं ।। दन्त बिवाई जन्म न आई कृश्ण चरित बिन, लोहे पडै न काठ की सूलूं ।। नींबडिये नारेल न हीेयबा । कृश्ण चरित बिन, छिलरे न हीेयबा होरू ।। तंूबण नागर बेल न हीेयबा । कृश्ण चरित बिन, बांवली न केली केलूं ।। गउ का जाया खगा न होयबा । कृश्ण चरित बिन,दया न पालत भोलू ।। सूरी का जाया हस्ती न होयबा । कृश्ण चरित बिन, ओछा कबही न पूख्ं ।। कागण का जाया कोकला न होयबा । कृश्ण चरित बिन, बुगली न जनिबा हंसू ।। ज्ञानी कै हदै प्रमोध आवत अज्ञानी लागत डांसू ।। १४ ।

    शब्द 15

    ओ3म सुरमा लेणा झींणा षब्दूं । म्हे भूल न भाख्या थूलूं।। सो पति बिरशा सींच प्रांणी । जिहिंका मोठा मूल समूलंू ।। पाते भूला मूल न खोजे । सींचो कोय कु मूलूं ।। विश्णु विश्णु भण अजर जरीजै । यह जीवन का मूलूं ।। खोज प्राणी ऐसा बिनाणी । केवल ज्ञानी ।। ज्ञान गहीरू । जिहिं कै गुणे न लाभत छेहूं ।। गुरू गेंवर गरवा षीतल नीरूं । मेवा ही अति मेउं ।। हिअै मुक्ता कमल संतोशी । टेवा ही अतिटेउं ।। चढ कर बोहिता भव जल पार लंघावै । सो गुरू खेवट खेवा खेहूं।। १५।।

    शब्द 16

    ओ3म लोहै हूंता कंचन घडियो । घ्डियों ठाम सुठााउं ।। घाटा हूंता पात करीलूं । यह कृश्ण चरित परिवाणूं ।। बोडी काठ संजोगे मिलिया । खेवट खेवा खेवू ।। लोहा नीर किसी बिध तरिबा । उत्तम संग सनेहूं ।। बिन किरिया रथ बैसैला । ज्यू काठ संगाणे लोहा नीर तरीलूं ।। नांगड भांगड भूला महियल । जीव हतै मड खाईलो ।। १६ ।।

    शब्द 17

    ओ3म् मोरै सहजै सुन्दर लोतर बाणी । ऐसा भयो मन ज्ञानी ।। तइया सांसू । तइया मासूं ।। रक्तूं रूहोयूं । खीरूं नीरूं ।। ज्यूं कर देखूं । ज्ञान अंदेसूं ।। भूला प्राणी कहै सो करणो।। अइ अमाणो । तत समाणो ।। अइया लोम्हे पुरशन लेणार नारी। सो दत सागर सो सुभ्यागत ।। भुवन भुवन दभिखियारी।। भीखी लो भिखियारीलो । जे आदि परम् तत लाधो।। जाकै बाद बिराम बिरासों ष्वासो । तानं कोन कहसी साल्हिया साधों। ।। १७ ।।

    शब्द 18

    ओ3म् जो कुछ कुछ जा कछू न जाणी । ना कुछ कुछ तो कुछ जाणी ।। ना कुछ कुछ अमृत बाणी ।। ज्ञानी सोतो ज्ञानी रोबत पढिया रोबत गाहे।। केल करन्ता मोरी मोरा रोगवत जोय जोय पगां दिखाहीं ।। उरध खेैणी मन उनमत रोवत। मुरखा रोवत धाहीं।। मर माघ संधारत ख्ेाती। के के औतारी रोवत राही।। जडिया बूंटी जे जग जीवै ं तो वंदा क्यूं मर जाई।। खोज प्राणी ऐसा बिनाणी । नुगरा खोजत नाहीं।। जां कुछ होता ना कुछ होयसी । बल कुछ होयसी तोही ।। १८।।

    शब्द 19

    ओ3म् रूम अरूप रमूं पिण्डे ब्रम्हण्डे, घट घट अघट रहायों। अनन्त जुगां में अमर भणी जूं। ना मेरे पिता न मायों ।। ना मेरे माया न छाया । रूप न रेखां । बाहर भीतर अगम अलेखा।। लेखा एक निरंत्र्जन लेसी । जहां चीन्हों तहां पायों।। अडसठ तीरथ हिरदा भीतर । कोई कोई गुरूमूख बिरला न्हायों ।।१९।।

    शब्द 20

    ओ3म् जां जां दया न मया। तां तां बिकरम कया। ।जां जां आबन बैसू । तां तां सिरगन जैसू । जां जां जीव न जोती। तां ता ंमोखन मुक्ती ।। जां जां दया न धर्मू । तां तां बिकर्म कर्मू ।। जां जां खोज्या न भूलूं । तां तां प्रत्यक्ष थूंलू ।। जां जां भेधा न भेंदू । तो स्वर्गे किसी उमेदूं ।। जां जां घमण्डैस घमण्डू । ताकै ताव न छायों । सूतै सांस नसायों ।।२०।।

    शब्द 21

    ओ3म् जिहिं कै सार असारूं । पार अपारूं । पार अपारूं । थाघ अथाघूं।। उमगया समाघूं ।। ते सरवर कितनीरूं । बाजाली भलबाजालो । बाजा दोय गहीरूं ।। एकण बाजै नीर बरसे। दूजै मही बिरोलत खीरूं ।। जिहीं कै सात असारूं । पार पारूं ।। थाघ अथाघूं । उमगया समाघूं ।। गहर गंभीरूं । गगन प्याले ।। बाजत नांदू । माण कपायो।। फरे लुकायो। नहीं लखायो।। दुनियां राती बाद बिबादूं । बाब बिबादे बाण खीणा ।। जयूं पहूपेखींणा भवरी भवरा । भावै जाण मजाण प्राणी जोलै कारिप जवरा। भेर बाजाती एक जोजनो । अथवा तो दोय जोजने। मेघ बाजातो पंच जोजनो ।। अथवा तो दस जोजनो । सोई उत्तम लेरे पांणी ।। जुगां जुगॉंणी सत करू जाणी। गुरू का शब्द ज्यूं बोला झींणी बाणी ।। जिहिं का दरां हूंतै दूर सुणोजै । सो शब्द गुणा कारूं गुणा सारूं बले अपारूं।।२१।।

    शब्द 22

    ओ3म् लो लो रे राजिंदर रायों । बाजै बाय सुबायों।। आभै अभो झुरायों । कालर करसण कीयों ।। नेपै कछू न कीयों। आइया उत्तम खेती ।। को को अमृत रायां । को को दाख दिखायों ।। को को ईख उपायों । को को नींव नीबोली । को को उपायों। को को नींव नीबोली। आक अकायों । को को कुछ कबायों। ताका पात कुपातू ।। ताका फल बीज कुबीजू ।। तो नीरे दोश किसायों क्यूं क्यूं क्यूं गए भागे ऊणा। क्यू क्यू कर्म बिहूंणा ।। को को चिडी चमेडी। को को उल्लू आयो।।ताक ज्ञान न तोतइ मोक्ष न मुक्ती याके कर्म इसायों।।तो नीरे दोश किसायों।।२२।।

    शब्द 23

    ओ3म् साहिल्या हुवा मरण मय भागा । गाफिल मरणे वणा डरै ।। सतगुरू मिलियो सत पंथ बतायो। भ्रान्त चुकाई मरणै बहु उपकार करै।। रतन काया सोभंति लाभै । पार गिराये जीव तिरे ।। पार गिराये सनेही करणी। जंपो विश्णु न दोय दिल करणी।। जंपो विश्णु न निन्दा करणी। मांडो कांध विश्णु कै सरणै।। अतरा बोल करो जे साचा । जो पार निरांय गुरू की बाचा ।। रवणा ठवणा चवरा भवण। ताहि परे रै । रतन काया छै ।। लाभै किसे विचारे । जे नबींये नवणी । खवीयो खवणी । जरिये जरणी । करिये करणी ।। तो सीख हुवां घर जाइये । रतन काया सांचे की ढोली ।। गुरू प्रसादे कवल ज्ञाने। धर्म अचारे । षीले संजमे । सतगुरू तुठे पाइये ।। २३ ।।

    शब्द 24

    ओ3म् आसण बैसण कूड कपट्ठण । कोई कोई चीन्हत वोजू बाटे ।। बोजू बाटे जे नर भया। काची काया छोड् कैलाषे गया ।। २४ ।।

    शब्द 25

    ओ3म् राजन भूलीलो । राजेन्द्र दुनीन बंधै मेरू ।। पवणा झोलै बीखर जैला। धुंवर तणा जै लोरू।।बोलस आभै तणा लहलोरू । आडा डम्बर केती बार बिलम्बण यो संसार अनेहं । भूला प्राणी विश्णु न जंप्यो ।। मरण विसारी केहूं। म्हां देखतां देव दाणू सुर नर खीण । जंबू मंझे राचि न राहिबां थेहूं । नदिये नीर न छीलर पाणी ।। धूं वर तणा जे मेहूं । हंस उडाणा पथ बिलब्यो ।ं श्र्रास सास निरास भईलो । ताछै होयसी रंड निरंडी देहूं ।। पवणा झोलै बीखर जैला। गैण बिलंबी खेहूं ।। २५ ।।

    शब्द 26

    ओ3म् धण तण जीम्या को गुण नाहीं । मल भरिया मण्डारूं ।ं आगै पीछै माटी झूलै । भूला बहैज भारूं घणा ।। दिनाका बडा न कहिबा बडा न लंघिबा पारूं ।। उत्तम कुला का उत्तम न हायबा । कारण किरिया सारू ।। गोरख दीठा सिध्द न होयबा । पोह उतरबा पारूं ।। कलज्रुग बरतै चेतो लोई । चेतो चेतण हारूं ।। सतगुरू मिलियो सत पंथ बतायो। भ्रांत चुकाई बिदगारातै उदगा गारूं ।।२६।।

    शब्द 27

    ओ3म् पढ कागल वेदूं षास्त्र षब्दू । पढ सुन रहिया कछू न लहिया ।। नुगरा उमग्या काठ पशाणो । कागल पोथा ना कुछ थोथा । ना कुछ गाया गेउं । किण दिष आवं किण दिष जावै । माई लखै न पीउं ।। इंडे मध्ये पिंड उपन्ना । पिंडा मध्ये बिंब उपन्ना ।। किण दिष पैठा जीउं । इंडा मध्ये जीव उपन्न ।। सुणरे काजी सुणरे मुल्लां । पीर ऋृशीष्वर रेमस बासी तीरथ बासी किण् घट पैठा जीउं ।। कंसा षब्दे कंस लुकाई । बाहर गई नरीउं ।। क्षिण आवै क्षिण बाहर जावै ।। रूत कर बरसात सीउं ।। सोवन लंक मंदोदर काजै जोय जोय भेद बिभीशण दीयों ।। तेल लियो खल चोपै जोगी । तिहिंको मोल थोडेरी कीयों ।। ज्ञाने ध्याने नादे वेदे जे नर लेणा । तत भी ताहीलीयों ।। करण वधीप सिंबर बल राजा हूई का फल लीयों ।। तारावे रोहितास हरिचन्द । काया दषबन्ध दीयों ।। विश्णु अजंप्या जन्म अकारथ । आके डोडा खींपे फलीयों ।। काफर बिबरजत रूहीयूं । सै तू भातू बहु रंग लेणा ।। सब रडा लेणा रूहीयूं ।। नानारे बहु रंग न राचै । काली उंन कुजीउं ।। पाहे लाख मजीठी राता । मोल न जिहिं का रूहीयूं ।। कब ही वो ग्रह उथरि आवै । सैतानी साथे लीयों ।। कब ही वो ग्रह उथरि आवै सैतानी साथे लीयों ।। ठोठ गुरू वृशाली पति नारी । जद बंके जव बीरू ।। अमृत का फल एक मन रहिंबा । मेवा मिश्ट सुभायों ।। अषुध्द पुरूष वृशली पति नारी । बिन परचै पार गिराय न जाई ।। देखत अन्धा सुणता बहरा । तासो कछु न बसाई ।। २७ ।।

    शब्द 28

    ओ3म मच्छी मच्छ फिरै जल भीतर । तिहिं का माघ न जोयबा ।। परम तत्व है ऐसा । आछं उरबार न ताछै पारू ।। वो बड छेबड कोई न थीयों । तिहि का अन्त लहीबा कंसा ।। ऐसा लोभल ऐसालो । भल कहो न कहा बहीरूं ।। परम तत्व कौ रूप न रेखा लीक न लेहूं खेजन खेहूं । बर्ण बिबरजत भावे खेजो बांवन बीरूं । मीन का पंथ मीनही जाणै ।।सुरंगम रहीयं । यिध का पथ कोई साण जाणत । बीजा बरतन बहियों ।। २८ ।।

    शब्द 29

    ओ3म गुरू कै शब्द असंख्य प्रबौधी परीलो । खारसमत्व परै परेरै चौखंड खरू पहला अन्त न पारू अन न्तकोड गुरू की दावन बिलम्बी करणी सांच तरी लो ।। सांझे जमां सबेरे थापण गुरू की नाथ डरी लो । भगवी टोपी थल षिर आयो हेत मिलाण करीलो ।। अंबाराय बधाई बाजै हृदै हरी सिंबरीलो । कृश्णा माया चोखंड कृश्णाणी जम्बू दीप चरीलो ।। जम्बूदीप देसो चर आयो इस कन्दर चेतायो ।। मान्यो षील हकीकत जाग्यो हकीकी रोजी धायों। ऊनाि नाथ कुपह का पेहमा आंण्या मोहका धुर पहंुचायों।। मोरै धरती ध्यान धनस्पती बासो ओजू मंडल छायों। गींदू मेर पगांणै पवत मनसा सोड तुलायों। अैजुग चार छतीसां और छतीसां, आश्रा बहे अंधारी म्हे तो खडा बिहायों। तेतीसां की बरग बहांम्हे बार काजै आयों ।। बारा थाप घणा न ठाहर । मतांतो डीले 2 कोड रचायों।। म्हे उंचे मण्डल का रायों । संमन्द बिराल्यो वासग नेतो मेर मथांणी थायो।। संसा अर्जूण मारयो कारज सारयो जद म्हे रहस दमामा बायों। फेरी सीत लई जब लंका तब म्हे ऊथे थायों। दह सिर का रश मस्तक छेद्या बांण भला निरतायों।। म्हे खोजी आपण होजी नाहीलह 2 खेलत हायों। कंसा सरंस जूव ै रमियां सहजे नन्द हरायों । कुंत कुंवारी कर्ण समानो तिहिका पोह पोह पडदा छायों। पाहे लाख मजीठी पाखो वन फल राता पींझू पाणी के रंग धायों।। तेपण चाखण चाख्या भाखन माख्या जोय 2 लियो फल फल केर रसायों। थे जोगन जोग्या मोगन मोग्या न चीन्हों सर रायों।। कण बिन कुकस कांये पीसो निष्चै सरी न कायों । म्ह अबधू निर पख जोगी सहज नगर का रायों।। जो ज्यूं आवै सो त्यूं थरपा साचा सूंसत भायों। मोरै मनहीं मुद्रा तनही कथा जोग मारग सहडायों ।। सात षायर म्हे कुरलै कीयों ना मैं पीया न रहयातिसायों। डाकण षाकण निंद्रा सुध्या ये म्हारै तांबै कूप छिपायों । म्हारै मनहीं मुद्रा तनही कथा जोग मारग सह लीयों। डाकण षाकण निंद्रा खुध्या ये मेरे मूल न थीयों ।। २९ ।।

    शब्द 30

    ओ3म् आयो हंकारो जीचडो बुलायो । कह जीवडा क्या करण कमायो ? थरहर कंपै जिवडो डोलै । उत माई पीवन कोई बोलै ।। सुकरत साथ सगाई चालै । स्वामी पवणा पाणी नवण करंतो चदे सूरे शीस नवन्तो । विष्णु सुरां पोह पूछ लहन्तो ।। इहिं खोटे जन मन्तर स्वामी । अहनिश तेरो नाम जंपतो ।। निगम कमाई मांगी मांग । सुरपति सथा सुरासू रंग सुरपति सुरां सूं मेलो ।। निज पोह खोज ध्याइये । भोम भली कृशाण भी भला ।। बूठो है जहां बाहिये । करशण करो सनेही खेती ।। तिसिया साख निपाइये । लुणचुणलीयो मुरा तब कीयो ।। कण काजै खडगाहिये । कणतुस झेडो होय नवेडो ।। गुरू मुख पवन उडाये । पवणा डोलै तुस उडेला कणले अर्थ लगाइये ।। यूं क्यूं भलो जे आप न जरिये । औरां अजर जराइये।। यूं क्यु भलो जे आप न फरिये । अवरां अफर फराइये ।। यूं क्यूं भलो जे आप न डरिये । अवरां अडर डराइये ।। यूं क्यूं भलो जे आप न मरिये । अवरां मारन धाइये ।। पहलै किरिया आप कमाइये । तो औरान फरमाइये ।। जो कुछ कीजै मरणै पहलै । मत कहि मर जाइये ।। शौच स्नान कियो जिन नाहीं । होय भतूला बहाइये ।। रतन काया मुख सूवर बरगों । अब खल झखे पाइये ।। सवामण सोनो करणै पाखो। किण पर वाह चलाइये। एक गऊ ग्वाला रिषि मांगी । करण पखो किण सुरह सुबच्द दुहाइये।। करण पखो किन कश्चन दीन्हों । राजा कवन कहाइये ।। रिण ऋमृध्ये स्वामी करण पाखो । कुण हीराडसन पुलाइये ।। किहिं निश धर्म हुवै धुर पूरो । सुर की सीाा समाइये ।। जेनबिए नवणी खबिए खवणी । जरिये जरणी ।। करिए करणी । तो सीख हुंया घर जाइए ।। अहनिश धर्म हुवै धुर पूरो ं सुर की सभा समाइये ।। किहिं गुण बिदरो पार पहूतो । करणै फेर बसाइये ।। मन सुख दान जु दीन्हों बिदरै । सुर की सभा समाइये ं निज पोह पाखो पार असीपुर । जाणी गीत बिवाहे गाईये ।। भरमी भूला बाद बिबाद । अचार बिचार न जाणत स्वाद ।। कीरत के रंग राता मुरखा मन हठ मरै । तेपार गिराए कित उतरै ।। ३० ।।

    शब्द 31

    मूल सींचो रे प्राणी । ज्यू का भल बुध्दि पावै । जामण मरण भव काल जु चूकै । तो आवा गवण न आवै । भल मूल सींचो रे प्राणी ।। ज्यूं तरवर मेलत ालूं । हरि परिहरि की आण न मानी झंख्या झूल्या आलूं देवा सेवां टेव न जांणी ।। न बंच्या जम कालूं भूलै प्राणी विश्णु न जंप्यो मूल न खोज्यो ।। फिर 2 जोया डालूं । बिन रैणायर हीरे नीरे ।। नगन सीपे तके न खोला नालूं । चलन चलंतै ।। बास बसंतै । जीव जीवंतै ।। काया नवंती । कांयरे प्राणी विश्णु न धती भालूं ।। घडी घटन्तर पहरपटन्तर । रात दिनंतर ।। मास पखन्तर । क्षिण ओल्हरबा कालूं ।। मीठा झूठा मोह विटंबणा ।। मकर समाया जालूं । कबही कोबाइंदो बाजत लोई ।। घडिया मस्तक तालूं। जीवां जूंणी पडै परसा ।। ज्यूं झींवर मच्छी मच्छा जालूं । पहलै जिवडो चेत्यो नाहीं ।। अब ऊंडी पडा पहारूं । जोवर पिंड बिछोडां होय सीता । दिन थाक रहै सिर मारूं ।। ३१।।

    शब्द 32

    ओ3म् कोट गऊ जे तीरथ दानों पंच लाख तुरड्र.म दानों ।। कण कंचन पाट पटंबर दानों । गज गेंवर हस्ती अति बल दानों ।। करण दधीच सिंवर बल राजा । श्री राम ज्यूं बहूत करै आचारूं । जां जां बाद बिबादी अति अहंकारी लबद सबादी । कृष्ण चरित बिन नाही उतरिबा पारूं ।। ३२ ।।

    शब्द 33

    ओ3म् कवन न हूवा कौन न होयसी । किन न सहयो दुख भारूं ।। कवन न गइया कवण न जासी । कवन रहया संसारूं ।। अनेक 2 चलंता दीठा । कलि का माणस कौन बिचारूं जो चित होता सो चित नाहीं । भल खोटा संसारूं । किसकी माई किसका भाई । किसका पख परवारूं । भूला दुनिया मर 2 जावै । न चीन्हों करतारूं ।। बिश्णु 2 तु भण रे प्राणी । बल 2 बारम्बारूं ।। कसणी कसबा भूल न बहबा । भाग परापति सारूं ।। गीता नाद कबीता नाऊं । रड फटारस टारूं। फोकट प्राणी भरमे भूला । भल जे यों चीन्हों करतारूं ।। जामण मरण बिगोवो चूकै । रतन काया ले पार पहूंचै ।। तो आवागवण निवारूं ।। ३३ ।।

    शब्द 34

    ओ3म् फुरण फहारे कृश्णा माया । घण बरसंता सर वर नीरे ।। निरी तिरन्ते जेतिस मरै तो मरियों । अन्नों धत्रों दूधू दहीयुं ।। घीऊ मेऊं टेऊ जे लाभंता । भूख मरै तो जीवनहीं बिन सरियों ।। खेत मुक्त ले कृश्णा अर्थों । जे कन्ध हरै तो हरियों ।। विश्णु जपन्ता जीभ जु थाकै । तो जीभडियां बिनसरिर्यु ।। भीखी लो भिखियारी लो । जे आदिपरमतत लाधो । जाकै बाद बिराम बिरांसो सांसो । तानै कोण कहसि साल्हिया साधो ।। ३४ ।।

    शब्द 35

    ओ3म् बल 2 भणत व्यासुं । नाना अगम न आसुं ।। नाना उदक उदासुं । बल 2 भई निरासुं ।। गल मैं पडी परासुं जां जां गुरू न चीन्हों ।। तइया सींच्या न मूलुं कोई 2 बोलत थूलूं ।। ३५ ।।

    शब्द 36

    ओ3म् काजी कथै कुराणों । न चीन्हों फरमाणों ।। काफर थूलभयाणों । जइया गुरू न चीन्हीं ।। तइया सींच्या न मूलूं । कोई 2 बोलत थूलूं ।। ३६ ।।

    शब्द 37

    ओ3म् लोहा लंग लुहारूं । ठाठा घडै ठाठारूं ।। उत्तमम कर्म कुभारूं । जइया गुरू न चींन्हो ।। तइया सींच्या न मूलू । कोई 2 बोलत थूलूं ।। ३७ ।।

    शब्द 38

    ओ3म् रेरे पिंड सीपंडू । निरघन जीव क्यूं खंडू ।। ताछै खंडा बिहंडू । घडीये सै घमंडू ।। अइया पंथकुपंथू । जइया गुरू न चीन्हों।। तइया सींच्या न मूलूं । कोई 2 बोलत थूलूं ।।३८।।

    शब्द 39

    ओ3म् उत्तम संग सुसंगू । उत्तम रंग सुलंगू ।। उत्त्म ढंग सुढंगू ।। उत्तम जंग सुजंगू । तातै सहज सुलीलूं । सहज सुपंथू । मरतक मोक्ष दुवारूं ।। ३९ ।।

    शब्द 40

    ओ3म् सन्त पताले लिहू तृलोके । चवदा भवने गगन गहीरे ।। बाहर भीतर सर्व निरंतर । जहां चीन्हों तहां सोई ।। सतगुरू मिलियो सतपंथ बतायो। भ्रांत चुकाई ।। अवर न बुझबा कोई ।। 40।।

    शब्द 41

    ओ3म् सुण राजेंन्द्र । सुण जोगेन्द्र ।। सुण ष्ेशिन्द्र। सुण सोफिन्द्र ।। सुण चाचिन्द्रं । सिध्दक साध कहांणी ।। झूठी काया उपजत बिणसत । जां जां नुगरे थिती न जांणी ।। ४१ ।।

    शब्द 42

    ओ3म् आयसां काहे काजै खेह भकरूडो । सेवो भूत मसांणी ।। घडै ऊंधै बरसत बहु मेहा । तिहिंमा कृश्ण चरित बिन पडयो न पडसी पाणी ।। योगी जगम नाद दिगम्बर । सन्यासी ब्रम्हचारी ।। मन हठ पढिया पंडित । काजी मुल्लां खेलै आपद वारी ।। निश्चै कायू बायों होयसै । जे गुरू बिन खेल पसारी ।। ४२ ।।

    शब्द 43

    ओ3म् ज्यूं राज गए राजिन्दर झूरै । खोज गए न खोजी ।। लाछ मुई गिरहायत झूरै । अरथबिहूंणा लोगी ।। मोर झडे कृसाण भी झूरै । खिंद गए न जोगी ।। जोगी जगम जपिया तपिया । जती तपी तकपीरू ।। जिहिं तुल भूला पाहण तोलै । तिहिं तुल तोलन हीरूं ।। जोगी सो तो जुग 2 जोगी । अब भी जोगी सोई ।। थे कान चिरावो चिरघट पहरो । आयसां यह पखंडा तो जोग न कोई ।। जटा बधारो जीव सिंधारो । आयसां यह पाखंड तो जोग न होई ।। ४३ ।।

    शब्द 44

    ओ3म् खरतर झोली खरतर कथा । कांध सहै दुख भारूं । जोगतणी थे खबर न पाई । कांय तज्या घरबारू ।। ले सुई धागा सीवण लागा। करड कसीदि मेखलीयों ।। जड जआधारी लंधै न पारी । बाद बिवादि बेकरणो ।। थे बीर जपो देताल धिया वो । कायब खोजो ततकणो ।। आयसां डंडत डंउू मुंडत मुंड मुंडत माया मोह किसो ।। भरमी बादी बादे भूला । काय न पाली जीव क्यों ।। ४४ ।।

    शब्द 45

    ओ3म् दोय मन दोय दिल सिंवीं न कंथा । दोय मन दोय दिल पुलीन पथा ।। दोय मन दोय दिल कही न कथा । दोय मन दोय दि ल सुणी न कथ्थ । दोय मन दोय दिल पंथ दुहेला । दोय मन दोय दिल गुरू न चेला ।। दोय मन दोय दिल बंधी न बेला । दोय मन दोय दिल रब्ब दुहेला ।। दोय मन दोय दिल सई न धागा । दोय मन दोय दिल भिडे न भागा।। दोय मन दोस दिल भवे न भेऊ । दोय मन दोय दिल टेव न टेऊं ।। दोय मन दोय दिल केल न केला । दोय मन दोय दिल स्वर्गे न मेला ।। रावल जोगी तां तां फिरयो । अण चींन्हें के चाहयों ।। काहे काजै दिशा बरखेलो । मन हठ सीख न कायों।ं जोग न जोग्या भोग न भोग्या । गुरू न चींन्हों रायो ।। कण विण कूकस कार्ये पीसा । निश्चै सरी न कायों ।। बिन पायचिये पग दुख पावै । अवधू लोहे दुखी सकायों ।। पारब्रहम की सुध्द न जांणी । तो नागे जोग न पायों ।। ४५ ।।

    शब्द 46

    ओ3म् जिहिं जोगी के मनहीं मुद्रा । तनहीं कंथा पिंडै अगन थभायों ।। जिहीं जोगी की सेवा कीजै । तठों भव जल पार लंघावै ।। नाथ कहावै मर मर जावै । सेक्यू नाथ कहावै ।। नान्ही मोटी जीवा जूंणी । निर त सिरतज फिर फिर पूइा आवै । हमहीं रावल हमहीं जोगी हम राजा के रायों । जो ज्यूं आवै सो त्यूं थरपां ।। साचा सुसंत भायों । जो ज्यू आवै सो त्यूं थरपां ।। साचा सुसंत भायों । पाप न छिपां पुण्य न ह रां ।। करां न करतब लावां बारूं कीव तडै को रि क न मेटू मूवां परहथ सारूं । दौरै भिस्त विचालै ऊभा ।। मिलिया काम सवारूं ।। ४६ ।।

    शब्द 47

    ओ3म् काया कंथा मन जौ गूंटो । सींगी सास उसासूं ।। मन मृग राखले कर कृशांणी । यूम्हें भया उदासूं ।। हमही जोगी हमही जती । हमही सती हमही राख बा चीतूं ।। पंच पटण नव थानक साधले । आद नाथ के भक्तूं ।। ४७।।

    शब्द 48

    ओ3म् लक्ष्मण 2 न कर आयसां । म्हारे साधां पडै बिराऊ ।। लक्ष्मण सो जिन लंका लीवी रावण मारयो । एसो कियो संग्राम । लक्ष्मण तीन भुवन को राजा ।। तेरे एक न गाऊं । लक्ष्मण कै तो लख चौरासी जीया जणी ।। तेरे एक न जीऊं । लक्ष्मण तो गुणवंतो जोगी । तेरे बाद बिराऊं । लक्ष्मण का तो लक्षमण नाहीं । शीस किसी बिध नाऊं ।। ४८ ।।

    शब्द 49

    ओ3म् अबधू अजरा जार ले । अमरा राख जे ।। राख ले बिन्द की धरणा । पताल का पाणी आकाष कूं चढायले । भेटले गुरू का दरषणों ।। ४९ ।।

    शब्द 50

    ओ3म् तइया सांसू तइया मासूं । तइया देह दसाई ।। उत्तम मध्यम क्युं जाणीजै घ् बिबरस देखो लोई ।। जाकै बाद बिराम बिरांसा सांसो । सरसा भोला चालै ।। ताकै भीतर छोतल कोई । जाकै बाद बिराम बिरांसो सांसो ।। भोलो भागो ताके मूले छोतन होई । दिल 2 आप खुदायबन्द जाग्यो । सब दिल जाग्यो सोई । जो जिंदो हज काबै जाग्यो । थल सिर जाग्यो सोई ।। नाम विश्णू कै मुसकल घातैं । ते काफर सैतानी ।। हिंदु होय कर तीरथ न्हावै, पिंड भरावै । तेपण रहया इवांणी ।। जोगी होय कै मुंड मुंडावै कान चिरावै। गोरख हटडी धोकै, तेपण रहया इवांणी ।। तुरकी होय हज काबो धोकै, भूला मुसलमाणी । के के पुरूश अवर जागैला , थल जाग्यो निज बाणी।। जिहिं कै नादे वेदे षीले षब्दे, लक्षणे अंत न पारूस्ं। अंजन माहिं निरंतर आछै,सो गुरू लक्ष्मण कवारूं ।।५०।।

    शब्द 51

    ओ3म् सप्त पताले भुंय अन्तर अन्तर राखिलो । म्हे अटला अटलूं ।। अलाह अलेख अडाल अयोनी षंभू । पवन अधारी पिंडजलु ।। काया भीतर माया आछै । माया भीतर दाया आछै ।। दाया भीतरछाया जिहिकै । छाया भीतर बिंब फलूं ।। पूरक पूर पूरले पोण ।। भूख नहीं अनजीमत कोण ।। ५१ ।।*

    शब्द 52

    ओ3म् मोह मण्डल थाप थाप ले । राख राख ले । अधरा धरूं आदेषबेसुं । ते नरेसुं ।। ते नरा अपरं पारूं । रण मध्ये से नर रहियों ।। ते नरा अडरा डरूं ।। ज्ञान षडगूं जथा हाथे। कोण होयसी हमारा रिपूं ।। ५२ ।।

    शब्द 53

    ओ3म् गुरू हीरा बिणजै लेहम लेहूं । गुरूनै दोश न देणा ।। पवणा पाणी जीम मेहूं भार अठारै परबत रेहूं ।। सूरज जोती परै परेरै । एती गुरूकै ष्रणै ।। केती पवली अरू जल बिम्बा । नवसै नदी न बासी नाला सायर एती जरणा ।। कोड निनावणै राजा भोगी । गुरू कै आखर कारण जोगी ।। माया राणी राज तजीलो । गुरू भेटीलो जोग सझीलो ।। पिंडा देख न झुरणा । कर कृषाणी बेफायत संइो । जोय 2 जीव पिंडै नीसरणा ।। आदै पहलू घडी अढाई । स्वर्गे पहुंता हिरणी हिरणा ं सुरां पुना तेतीसां मेलो । जे जीवन्ता मरणों ।। के के जीव कुजीव । कुधार कलोतर बाणी ।। बादीलो हंकारी लो । वैभार घणाले मरणो । मनषारे तै सूतै सौयो खूलै खोयो । जड पाहन संसा बिगायो ।। निरफल खोड भिरांति भूला । आस किसी जा मरणो ।। बेसाही अन्ध पडयो गल फंध । लियों गल बंध गुरूबरजतै । हेलै स्याम सुन्दर कै टोडै । पारस दुस्तर तरणो । निश्चै छेह पडैलो पालो ं गोवल बास जु करणो ।। गोवल बास कमाय ले जिवड। सो स्वर्गां पुर लहणा ।। ५३ ।।

    शब्द 54

    ओ3म् अरूण बिवांणे रै रवी भांणै देव दिवांणे । विश्णु पुराणे ।। बिंबाबांणे सूर उगाणे । विश्णु बिवाणे । कुश्णा पुरांणे । काय झंख्यो तै आल पिराणी ।। सुर नर तणी सबेस्ं। इंडो बिंबा लोयण ।।पुरूष भलो निज बाणी । वाकी म्हरी एका संजमे षीले सहज पती ना । तिहीं अचारीनै चीन्हत कौण।। जाकी सहजे चूकै आवागवण ।। ५४ ।।

    शब्द 55

    ओ3म् रण घटियेकै खोज फिरन्ता । सुण सेवन्ता खोज हस्ती को पायो ।। लूंकडिये को खोज फिरंता । सुण सेवन्ता खोज सुरह को पायो ।। मोथडिये कै गूंढ खणंता सुण सेवन्ता लाधो थान सुथानो ।। रांघडिये को घाट घडंता सुण सेवन्ता । कंचन सोनो डायों ।। हस्ती चडंता गेंवर गुडन्ता । सुणहीं सुणहां भूंकत कायों ।। ५५ ।।

    शब्द 56

    ओ3म् कुपात्र कू दान जु दियो । जाणै रैन अंधेरी चोर जु लियो ।। चोर जु लेकर भाखर चढियों । कह जिवडा तै कैनै दियों ।। दान सुपाते बीज सुखेते अमृत फुल फलीजै काया कसोटी मन जो गूंटो । जुरणा ढाकण दीजै थोडे मांहि थोडेरों दीजै होने नाह न कीजै ।। जोय 2 नाम विश्णु के बीजै ।। अनन्त गुणा लिख लीजै ।। ५६ ।।

    शब्द 57

    त्र्प्रो3म् त्र्प्रति बल दानो सब स्नानो । गऊ कोट जे तीरथ दानो । बहुत करै त्र्प्राचारूं । ते पण जोय जोय पार न पायो ।। भाग परापति सारूं । घट ऊंधै बरषत बहु मेहा ।। नीर थयो पण ठालूं । को होयसी राजा दुर्योधन सो ।। विश्णु सभाा मह लाणो । तिणही तो जोय 2 पार न पायो ।। ध बिच रहीयों ठालूं । जपिया तपिया पोह बिन खपिया ।। खप 2 गया इवांणा । तेऊ पार पहूंता नाहीं ।। ताकी धोती रही अस्मानी ।। ५७ ।।

    शब्द 58

    ओ3म् तउवा माण दुर्योधन माण्या । अवर भी माणत माणूं ।। तउवादान जू कृष्णी माया ।। और भी फूलत दानो । तउवा जाण जू सहस्त्र झूझ्या और भी झूण्त जाणो ।। तउवा बाणजुं सीता कारण लक्ष्मण खेंच्या ं और भी खैचत बाणैं ।। जती तपी तकपीर ऋषीश्वर । तोल रहया शैतानो ।। तिण किण खैच न सके । षंभु तणी कमाणूं ।। तेऊ पार पहूंता नाहीं । तेकीयो आपो भाणों ।। तेऊ पहूंता नाहीं । ताकी धोती रही अस्माणी ।। बारां काजै हरकत आई । अध बिच मांडयो थांणो ।। नारसिंह नर नराज नरवो । सुराज सुरवो ।। नरां नरपति । सुरां सुरपति ।। ज्ञान न रिंदो बहु गुण चिन्दो ।। पहलू प्रहलादा आप पतलीयो । दूजा काजै काम बिटलीयो । खेत मुत्क ले पंच करोडी ।। सो प्रहलादा गुरू की बाचा बहियो ं। ताका षिखर त्र्प्रपारूं ।। ताको तो बैकुंठे बासो । रतन कायादे सौंप्या छलत भंडारूं ।। तेऊ तो उरवारे थाणो । त्र्प्रई त्र्प्रमाणे ।। तत् समाणो । बहु प्रमाणो । पार पहूंचण हारा लंका के नर षूर संग्रामे घण विरांमें ।। काले काने भला तिकट पहले जूझ्या बाबर झंट ।। पडै ताल समंदा पारी । तेऊ रहीया लंक दवारी ।। खेत मुत्कले सात करोडी । परषुराम के हुकम जे मूवा ।। सेतो कृष्ण पियारा । ताको तो बैकुंठे बासो ।। रतन काया दे सौंप्या छलत भंडारूं । तेऊ तो उरवारे थाणो ।। त्र््रप्रई त्र्प्रमाणा । पार पहुंचन हारा ।। काफ रखानो बुध्दिभराडो । खेत मुक्तले नव करोडी राव युधिष्ठर सेतो कृष्ण पियारा । ताको तो बैकुण्ठ बासो ।। रतन काया दे सौंप्या छलत भंडारूं । तेऊ तो उरवारे थाणो ।। त्र्प्रई त्र्प्रमाणो ।। बहु परमाणो ।। पार पहूंचन हारा ।। बारा काजै हरकत त्र्प्राई । तातें बहुत भई कसवारूं ।। ५८ ।।

    शब्द 59

    त्र्प्रो3म् पढ कागल वेदां षास्त्र शब्दूं । भूला भूले झंख्या त्र्प्रालू ।। त्र्प्रहनिश त्र्प्राव घटंती जावै । तेरा सास सबी कसवारूं ।। कइया चन्दा कइया सूरूं । कइया काल बजावत तूरूं ।। ताछै बहुत भई कसवारूं । रक्तसबिन्दु पर हस निन्दु । त्र्प्राप सहै तेपण बूझै नहीं गवारूं ।। ५९ ।।

    शब्द 60

    त्र्प्रो3म् एक दुख लक्ष्मण दंधू हइयों पर एक दुख बूढै घर तरणी त्र्प्रइयों ।। एक दुख तूठै सै व्यवहारूं । तेरे लक्षणे त्र्प्रन्त न पारूं । सहै न षक्ति भारूं । कै तै परशुराम का धनुषजे पइयों ।। कैतै दाव कुदाव न जाण्यो भइयूं । लक्ष्मण बाण जे दहशिर हइयों ।। एतो झूझ हमें नहिं जाणो । जे कोई जाणै हमारा नाऊं ।। तो लक्ष्मण ले बैकुण्ठे जाऊं । तो बिन ऊभा पह प्रधानो तो बिन सूना त्रिभुवन थानो । कहा हुवो जे लंका लइयों ।। कहा हुत्र्प्रो जे रावण हइयों । कहा हुत्र्प्रा जे सीता त्र्प्रइयों ।। कहा करूं गुणवत्ता भइयों । खल कै साटै हीरा गइयों ।। ६० ।।

    शब्द 61

    ओ३म् कैतै कारण कि रिया चुक्यो । कैतै सुरज सामो थुक्यो । कैतै उभै कांसा मांज्या । कैतैं छान तिनुका खेंच्या । कैतैं उभे कांसा मांज्या । कैतैं छान तिनुका खैंच्या । कैंतै ब्राम्हण नवत बाम्हण नवत बहोड्या । कैतैं आवा कोरंभ चोरया । कैतैं बाडी का बन फल तोड्या । कैतैं जोगि का खप्प्रर फोड्या।कैतैं बाम्हण का तागा तोड्या । कैतैं बैर बीरोध धन लोड्या । कैतैं सुवा गाय का बच्छ बिछोड्या । कैतैं चरती पिवती गऊ बीडारी । कैतैं हरी पराई नारी । कैतैं सगा सहोदर मारया । कैतैं तिरिया शिर खडग उभारया । कैतैं फिर तैं दातण कीयों । कैतैं रण में जाय दों दियो । किसे सरापे लक्ष्मण ह्इयुं ।।६१॥

    शब्द 62

    ओ३म् नामो कारण किरिया चुक्यो । नामै सुरज साम्हो थुक्यो । नामै ऊभैं कांसा मांज्या । नामैं छान तिणुका खैच्या । नामै ब्राम्हण नवत बहोडया । नामैं बाडी का बनफल तोडया । नामै जोगो का खप्पर फोडया । नामै ब्राम्हण का तागा तोडया । नामै बैर बिरोध धन लोडया । नामै सुवा गाय का बच्छ बिछोडया । नामै चरती पिवति गऊ बिडारी । नामै हरी पराई नारी । नामै सगा सहोदर मारया । नामै बाट कूट धन लियो । एक जू औगुण रामै कीयों । अणहोत मिरघो मारण गईयों। दूजो ओगुण रामै कियो । एको दोश आदोशा दियों । बनखंड में जद साथर सोइयों । जद को दोश तदों को होइयों॥६२॥

    शब्द 63

    ओ३म् आतर पातर राही रुक्मन् । मेल्हा मंदिर भोयो । गड सोवना तेपण मेल्हा । रहा छडा सी जोयों । रात पडता पाला मी जाग्या । दिवस तपता सुरुं । ऊन्हा थाडा पवना भी जाग्या।घन बरसता नीरुं । दुनीतणा ओचाट भी जाग्या । के के नुगरा देता गाल गहीरुं । जिहि तन ऊंना ओढण आढा । तिहिं ओढता चीरु । बारा काजै पडो विछोहो । संभल २ भुरु । राघो सिता हनवत पाखो । कोन बंधावत धीरु । मागर मणीयां काच कथिरुं । हीरस हीरा हीरुं।विषा पटंतर पडता आया । पूरस पूरा पूरुजे रिण राहे सूर गहिजै । तो सुरस सूरा सूरु । दुखिया है जे सुखिया होयसै । करसै राज गहिरु । महा अंगीठी बिरपा ओल्हो । जेठ न ठंडा नीरुं । पलंग न पोढण् । सेज न सोवण । कंठ रुलंता हिरुं । इतना मोह न मानै शंभु । तही तहीं तहीं सूसीरुं। घोडा चोली बाल गुदाई । श्री राम का भाई। गुरु की बाचा बहियों। राघों सिता हनवत पाखो । दुख सुख कासूं कहियो॥६३॥

    शब्द 64

    ओ३म् मैंकर भुलामंड पिराणी । काचै कन्ध अगाजूँ । काचा कंन्ध गले गल जायसैं । बीखर जैला राजों । गड बड गाजा कांय बिबाजा । कण बिण कूकस कांय लेणा । कांय बोलो मुख ताजों । भरमी बादी अति अहंकारी । लावत यारी । पशुवां पडै भरांन्ति । जीव विणासै लाहै कारणै । लोभ सवारथ खायबा खाज अखाजों। जो अति काले ले जम काले तेपण खीणा । जिहिं का लंका गढ था राजों बिन हरित पाखर बिन गज गुडियों । बिन ढोला डूमां लाकडीयों । जाकै परसण बाजा बाजै। सो अपंर पर काय न जपो हिंदू मुसलमानों । डर २ जीवकै काजै । रावा रंका राजा रांवां। रावत राजा। खाना खोजां। मीरां मुलका घंघ फकींरा। घंघा गुरंवा। सूर नर देंवा। तिमर जू लंगा। आय सां जोय सां । साह पुरोहितां । मिश्रही ब्यासां रुखां बिरंखा । आव घटंती । अतरा माहे कूणं विशेषो मरणत एको माघों । पशु मुकेरुं लहैन फेरु । कहै जमेरु सब जग केरुं । साचै सै हर कर घणेरु । रिण छाणैज्यूं बीखर जैला । तातै मेरु न तेरुं।विसर गया ते माघूं । रक्तूं नातू सेतूं धातूं । कुमलावै ज्यूँ सागूं जीवर पिंड बिंछोवा होयसी । तदिन दाम दुगाणी। आडण पैको रती बिसोवा सीभे नाहीं।ओपिंड काम न काजूं।आवत काया लेआयो थो जातैं सुको जागो । आवत खिण एक लाई थी । पर जातै खिणी न लागो । भाग परापति कर्मा रेखां । दरंगे । जबला २ माघों । बिरखे पान भडे भड जायला । तेंपण तई न लागूं । सेतूं दगधू कवलज कलीयों । कुमलावै ज्यूं शांगूं । ऋतूबशंती आई । और भलेरा शांगूं । भुला तेण गयारें प्राणी । तिंही का खोज नमाघूं । विष्णू २ भण लई न साई । सुर नर ब्रम्हा को न गाई । तातैं जबर बिन डसीरे भाई । बास बसंत कीवी । न कमाई । जबर तणा जमदूत दहैला । तातै तेरी कहा न बसाई॥६४॥

    शब्द 65

    ओ३म् तउवा जाग जु गोरख जागा । निरह निरंजन निरह निरांलब । जुग छ्तीसों एकै आसन बैठा बरत्या । और भी अवधू जागत जा़गूँ । तउवा सीर जो ईशवर गोरी और भी कहियत सीरुं । तउवा बीर जो राम लक्ष्मण और भी कहियत बीरों । तउवा पाग जो दश शिर बांधी । और भी बांधत पागो । तउवा लाज जो सिता लाजी । और भी लाजत लाजूं । तउवा पाज जो सिता कारण लक्ष्मण बांधी । और भी बांधत पाजूं । तउवा काज जो हनुमत सारा । और भी सारत काजूं । तउवा खागज जो कुम्भकरण महरावण खाज्या । और भी खावत खागूं । तउवा राज दुर्योधन माण्या । और भी माणत राजूं । तउवा रागज कन्हण बांणी । और भी कहिये रागूं । तउवा माघ तुरंगम तेजी । ट्टू तण भी माघूँ । तउवा शागज नागरवेली । कूकर बगरा भी शागूं । जां जां शैतानी करै उफारुं । तां तां महंतज फलियों । जुरा जम रा़क्षस जुरा जुरिनद्र । कंश केशी चंडरुं । मधु किचक हिरणाज्ञ हिरणाकुश चक्र धर बलदेऊ । पावत बासुदेवों । मंडलीक कांय न जोयबा । इंहि धर ऊपर रती रहिबा राजूं॥६५॥

    शब्द 66

    ओ३म् ऊमाज गुजाज पंज गंज यारी । रहिया कुपहीया शैतान कि यारी । शैतानलो भल शैतान लो । शतान बहो जुग छायो । शैतान की कुबध्या न खेती । ज्यूं काल मध्ये कुचील्यूँ । बे राही बे किरियावन्त कुमती दौरे जायसै । शैतानी लोडत रलियों । जां जां शैतान करै उफारुं । तां तां महंत न फलियों । नील मध्ये कुचील करबा । साध संगिणी थुलूँ । पोहप मध्ये परमला जोती । यूं स्वर्ग मध्ये लीलूँ।संसार में उपकार ऐसा । ज्यूँ रूँ ही मध्ये खीरुं॥६६॥

    शब्द 67

    ओ३म् श्री गढ आल मोत पुर पाटण भुय नागोरी । म्हे ऊंडे नीरे अवतार लीयों । अठगी ठंगण् । अदगी दागण् । अगजा गंजण् । ऊंनथ नाथण् । अनू नवावन । कहिं को मै खैकाल कीयों । काही सुरग मुरादे देसां काहीं दौरे दियुं । होम करीलो दिन ठावीलो । सहसर चीलो छापर नीबी दूणपूरुं । गांम सुंदरीयो छीलै बलदीयो । छंदे मन्दे बाल दीयो । अजम्हे होता नागो वाडै । रैण थंभै गढ गागरणो कुं कुं कंचन सोरठ मरहठ् । तिलंग दीप गढ गागरणो । गढ दिल्ली कंचन अर दूणायर् । फिर २ दुनियां परखें लीयों । थटै भवनिया अरु गुजरात । आछो जाई सवालाब मालवै परबत माडूँ माहीं ज्ञान कथूं । सुरसाण गढ लंका भीतर गूगल खेऊं पैरठयों । ईडर कोट उजैणी नगरी । कहिंदा सिंधपुरी विश्रामलीयों । कांय रे सायरा गाजै बाजै घुरै घुरहरै करै इवाणी आप बलूं । किंही गुण सायरा मीठा होता । किंही अवगुण हुओ खार खरुं । जद बासगनेतो मेर मथाणी । समंद विरोल्यो ढोयरण् । रैणायर डोहण पाणी पोहण् । असूरां बेधी करण छलूँ । दशशिर का दशमस्तक छेदा । ताणू बाणू लडू कुलूं । सोखा बाणू एक बखाणू । जाका बहु परवाणुं । निश्चय राखी तास बलूँ । राय विष्णु से बाद न काजै । कांय बधारो दैत्य कुलुं । म्हेपण म्हैई थेपण थेई । सा पुरुषा की लच्छ कुलुं । गाजै गुड्कै से क्युं बीहै । जेफल जाकी सहस फणूँ । मेरे माय न बाप नब हण न भाई । साख न सैण न लोक जणों । बैकुण्ट विश्वास बिलम्बण् । पार गिरंये मात खिणूं । विष्णु २ तू भण रे प्राणी । विष्णू भनन्ता अनन्त गुनूं । सहसे नावैं । सहसे ठावें । सहसे गावै । गाजै बाजे । हीरे नीरे । गगन गहीरे । चवदा भवणे. तिहूं त्रुलोके जम्बु दीपे सप्त पताले । अई अमाणो । तत समाणो । गुरु फरमाणो । बहु परवाणो । अइयां । निरजत सिरजत नान्हीं मोटि जीया जूणी । एती सास फुंरतै सारुं । क्रुषि माया धन बरषंता । म्हे अगिणी गिण फूहारुं । कुण जाणै म्हे देव कुदेवो । कुण जाणै म्है अलख अभेवों । कुण जाणो म्हेसुर नर देवों । कुण जाणो म्हेग्यनि के ध्यानी । कुण जाणो म्हे केवल ज्ञानी । कुण जाणो म्हे ब्रह्म ज्ञानी । कुण जाणै म्हे ब्रम्हज्ञानी । कुण जाणै म्हेब्रम्हचारी । कुण जाणै म्है अल्प अहारी । कुण जाणै म्है पुरुष कनारी । कुण जाणै म्हे बाद बिबादी । कुणै जाणै म्हेलुब्ध सबादी । कुण जाणै म्हे जोगि कै भोगी । कुण जाणै म्है आप संयोगी । कुण जाणै म्हे भावत भोगी।कुण जाणै म्है लील पत । कुण जाणै म्है सूम कदाता । कुण जाणै म्है सती कुसती । आपही सूमर आपही दाता।आपही कुसती आपै सती।नव दाणूं निरवंश गमाया कैरव किया फती फती । राम रुप कर राक्षस हडिया । वाण कै आगै बनचर जुडिया।तद म्हे राखी कमल पती।दया रुप म्हे आप बखाणां।संहार रुप म्हे आप हती । सौलै सहस्त्र नव रंग गोपी । भोलम भालम । टोलम टालम्।छोलम छालम सहजै राखीलो म्हे कन्हड बालों आप जती । भोलबीया म्हे तपी तपेश्व्रर् । छोलब कीया फती । राखण मतां तो पडदै राखां।ज्यूँ दाहै पान बणास पति॥६७॥

    शब्द 68

    ओ३म् बै कबराई अनंत बधाई । बै कब्रराई स्वर्ग बधाई।यह कब्रराई खेह रलाई । दुनियां रोले कवर किसो । कण बिण कूकस रस बिन बाकस् । बिन किरिया परिवार किसो । अरथू साहण थाटूं । धवेंका लहलोर जिसो । सो शा—धर जपरे प्राणी । जिहिं जपिये हुवै धरम इसो । चलन चलैत बास बसतै । जीव जिवैंत । काया नवंती । सास फुरंते । किवी न कमाई तातै जबर बिन ड्सी रे भाई । सुर नर ब्रह्मा कोउ न गाई । माय न बाप न बहन न भाई । इंतन मिंत लोक जणो । जबर तण जमदूत दहैला । लेखो लेसी एक जणो॥६८॥

    शब्द 69

    ओ३म् जबरारे तैं जग डांडी लो । देह न जीती जांणो । माया जालेले जम काले । लेणा कोण समाणो । काचै पिंडे किसी बडाई । भोलै भूल अयाणो । म्हां देखंता देव दाणु । सुर नर खीणा । बीच गया बेराणो कुभकरण महरावण होता । अबली जोध अयाणो । कोट लंका गढ विषमा होता । कांयदा बस गया रावण राणो । नौग्रह रावण पाए बन्धा । तिस बीह सुर नर शंक भयाणो । ले जम कालै अति बुध वंतो।सिता काज लुंभाणो । भरमि बादी अति अंहकारी । करता गरब गुमानो । तेऊ तो जम काले खीणा । थीर न लाथो थाणो । काचैं पिंड अकाज अफारुं । किसो पिराणी । माणो । साबण लाख मझीठ बिगूता । थोथा बाजार घाणो । दुनियां राचै गाजै बाजै । तामै कणू न दाणू । दुनियां के रंग सब कोई राचै । दीन रचै सो जाणो लोही मास बिकारो होयसी । मुर्ख फिरै अयाणो । मागर मणिया काच कथीरन राचो । कूडा दूनी डफाणो । चलन चल्न्ते । जीव जीवन्तै । काया नवन्ति । सास फुरंते । कांयरे प्राणी विष्णु न जप्यो । कीयो कंधे को ताणो । तिहिं ऊपर आवैला जबर तणा दल् । तास किसो सहनाणो । ताकै शीष न ओढ्ण् । पाय न पहरण नैवा फूल भयाणो । धन कन बाण न टोपन अंगा । टाटर चुगल चयाणो । साल सुंचगी घ्रुत सुबासो । पीवण न ठंडा पाणी । सेजन सोवण् । पंलग न पोढण् । छात न मैडि माणो । नवां दइया । नवां मइया । नागड दूत भयाणो।काचा तोड नीकुचा भाषै । अघट घ्टै मल माणो । धरती अरु असमान अगोचर । जातै जीवम तेही जाणो । आवत जावत दीसै नाही । साचर जाय अयाणो । जवर तणा जमदूत दहैला । मनबैसैं ला माणो । तातै कलीयर कागा रोलो । सूना रह्या अयाणो । आयसां जोयसां भणता गुणंता । वार महूर्ता पोथो थोथा । पुस्तक पढीया वेद पुराणों । भुत प्रेती कांय जपीजै । यह पाख्नण्ड परमाणो । कान्ह दिशावर जेकर चालो । रतन काया ले पार पहूंचो । रहसो आवा जाणो । ताह परेरै पार गिरांये । ततकै निश्चल थाणो । सोअपरं पर कांय न जंपो । ततखिण लहो इमाणो । भल मूल सींचो रे प्राणी । ज्यूँ तरवर मेलत डालू । जइया मूल न सींच्यो । तो जामण मरण बिगोवो । अहनिश करणी थीर न रहिबा । न बंच्यो जम कालूं । कोइ २ भल मूल सींची लो । भल तत्त्व बू—लो । जा जीवन की बिध जाणी । जीव तडा कछू लाहो होसी । मूवा न आवत हांणी॥६९॥

    शब्द 70

    ओ३म् हक हलालु हक साच क्रुष्णों । सुकृत अह्ल्यो न जाई । भल बाहिलो भल बीजीलो पवणा बाड बलाई । जीव कै काजै खडो जे खेती । तमैं ले रखवोलो रे भाई । दैतानी शैतानी फिरैला । तेरी मत मोरा चर जाई । उन मुन मनवा जीव जतन कर् । मन राखी लो ठाई । जीव कै काजै खडो जे खेती । बाय दवाय न जाई । न तहां हिरणी न तंहा हिरण् । न चोन्हों हरि आई । न तहां मोरा न तंहा मोरी । न ऊंदर चर जाई । कोई गुरु कर ज्ञानी तोडत मोहा । तेरो मन आराध्यो राव युधिष्ठिर । सो आरोधो रे भाई॥७०॥

    शब्द 71

    ओ३म् धवण धूजै पाहण पूजै । वेफ्रमाई खुदाई । गुरु चेलै कै पाए लागै देखो लोग अन्याई । काठि कण जो रुपा रेहण् । कापड माह छिपाई । नीचा पड पड तानै धोकै । धीरा रे हरि आई । ब्राम्हण नाऊं लादण रुडा । बूता नाऊं कूता बै । अपहाने पोह बतावै । बैर जगावैं सूता । भूत परेती जाखाखांणी । यह पाखंड परवाणो । बल २ कूकस कांय दलीजै । जामै कणूं न दाणू । तेल लीयो खल चोपै जोगी । खलपणसूंघी बिकाणो । कालरबीज न बीज पिराणी । थल सिर न कर निवाणो । नीर गण छीलर काय सोधो । रीता रह्या इवाणी । भवंता ते फिरंता । फिरंता ते भवंता । मडे मसाणे । तडे तडंगे । पडे पखाणे । हांतो सिध न कोई । निज पोह खोज पिराणी । जे नर दाबों छोडयो मेर चुकाई । राह तेतीसों की जाणी॥७१॥

    शब्द 72

    ओ३म् वेद कुराण कुमाया जालूँ । भुला जीव कु जीव कु जाणी । बसंदर नहीं नख हीरुं । धर्म पुरुष सिरजीवै पूरुं । कलि का मायाजाल फिटाकर प्राणी । गुरु की कलम कुरांण पिछाणी । दिन गुमान करैलो ठाली । ज्यूं तिस चुकावै पाणी । मैनर पूरा सरबिण जो हारा । लेसी जाकै ह्रुदय लोयण् । अंधा रहा इवांणी । निरख लहो नर निरहारी । जिन चोखंड भीतर खेल पसारी । जंपो रे जिण जंपे लाभै । रतन काया ए कहांणी । काहीं मारुं काहीं तारुं । किरीया बिहूंणा पर हथ सारु । शील दहूं उबारुं उन्है । एकल एह कहांणी । केवल ज्ञानी थल शिर आयो । परगट खेल पसारी । कोड तेतीसो पोह रचावण हारी । ज्यूं छक आई सारी॥७२॥

    शब्द 73

    ओ३म् वेद कंकहडी मंडप मैडी । जहां हमारा बासा । चार चक नव दिप थरथरे । जो आपो परकांसू । गुणियां म्हारा सुगणा चेला । म्हे सुगणा का दासूँ । सुगणा होय सैं स्वर्गे जासै । नुगरा रहा निरासुँ । जाका थान सुहाया घर बैकुण्ठे । जाय संदेशो लायो । अमियां ठमिया अम्रुत भोजन । मनसा पलंग सेज निहाल बिछायों । जागों जोवो जोत न खोवो । छ्ल जासी संसारु । भणी न भणबा । सुणी न सुणबा । कही न कहबा । खडी न खडबा । रे भल क्रुषाणी । ताकै करण न घा तो हेलो । कलीकल जुग बतै जैलो । तातै नहीं सुरां सो मेलो॥७३॥

    शब्द 74

    ओ३म् कडवा मीठा भोजन भक ले । भखकर देखत खीरु । धर आखरडी साथर सोवण् । ओढण ऊना चीरु । सहेज सोवण पोह का जागण् । जे मन रहिबा थीरु । स्वर्ग पहेली सांभल जिवडा । पोह उतरबा तीरु॥७४॥

    शब्द 75

    ओ३म् जोगी रे तू जुगत पिछांणो । काजी रे तू कलम कुराणी । गऊ बिणासो काहे तानी । राम रजा क्यूँ दीन्हि दान कान्ह चराई रनबे बानी । निरगुन रुप हमें पतियानी । थल शिर रह्या अगोचर बानी। ध्याय रे मुंडिया पर दानी । फीटा रे अण होता तानी । अलख लेखो लेसी जानी॥७५॥

    शब्द 76

    ओ३म् तन मन धोइये संजम हुइये । हरष न खोइये । ज्यूं ज्यूं दुनिया करै खुवारी । त्यूं त्यूं किरीया पूरी । मुग्धां सेती यूँ ठल चालो । ज्यूँ खडकै पात धनुरी॥७६।।

    शब्द 77

    ओ३म् भुला लो भल भूलालो । भूला भूल न भूलु।जिहिंठूंठ्डाये पान न होता । ते क्यु चाहत फूलूँ । को को कपूर घूंटी लो बिन घूटी नहीं जाणी । सतगुरु होयबा सहजे चीन्हबा । जाचंध आल बखाणी । ओछी किरीया आवै फिरीयां भ्रांती स्वर्ग न जाई । अन्त निरंजन लेखो लेसी । पर चीन्हे नहीं लोकाई । कण बिन कूकस रस बिन बाकस् । बिन किरीया परिवार । हरि बिन देहरै जाण न पाव् । अम्बाराय दवारु॥७७॥

    शब्द 78

    ओ३म् नवै पोल नवै दरवाजा । अहूंठ कोडरु रायजडी।कांयरे सींचो बनमाली। इहि बाडी तो भेल पड्सी । सुबचन बोल सदा सुहलाली । नाम विष्णु को हरे सणो । घण तण गडबड कायों बायों । निज मारग तो बिरला कायों । निज पोह पाखो पार असी पर जाणम गाह मै गायो गूणो । श्रीराम में मति थोडी । जोय २ कण बिन कूकस कायों लेणा॥७८॥

    शब्द 79

    ओ३म् बारा पोल नवै दरसाजी । राय अथरगढ थीरु । इस गढ कोई थीर न रहिबा । निश्चै चाल गया गुरु पीरु॥७९॥

    शब्द 80

    सत्तर लाख असी पर जंपा । भले न आवै तारु॥८०॥

    शब्द 81

    ओ३म् भल पाखंड मंडा । पहला पाप परा छ्त खंडा । जा पाखंडी कै नादे वेदे शीले शब्दे वाजत पौण । ता पाखडीनै चीन्हत कौण् । जाकी सहजै चूकै आवा गौण॥८१॥

    शब्द 82

    ओ३म् अलख २ तू अलख न लखणा । तेरा अनन्त इलोलूं । कौन सी तेरि करणी पूजै । कौन सैं तिहिं रुप सतलूं॥८२॥

    शब्द 83

    ओ३म् जो नर घोडै चढै पाग न बांधे । ताकी करणी कौन बिचारुं । शुचियारा होयसी आय मिलसी । करडा दोजग खारु । जीव तडेको रिजक न मेटूं । मूवा परहथ सारुं । हाथ न धोवै पग न पखालै । नाहर सिंह नर काजूं । जुग अनंत अनंत वरत्या । म्हे सून मडल का राजूं॥८३॥

    शब्द 84

    ओ३म् मूड मुंडायो मन न मुडायो । मोह अब खल दिल लोभि । अंदर दया नहीं सुरकाने । निंदराहडै कसो भी । गुरु गत छुटी टोट पडैला । उनकी आवा एकपख सातो वै करणी हूंता खूधा । असी सहस नव लाख भवैला कुभीं दौरे ऊंधा॥८४॥

    शब्द 85

    ओ३म् भोम भली क्रुषाण भी भला खेवट करो कमाई । गुरु प्रसाद काया गढ खोजो । दिल भीतर चोर न जाई । थलिये आय सतगुरु परकाश्यो । जो लै पडि लोकाई । एक खिण मै तीन भवन म्हें पोखां । जीवा जूण सवाई । करण समो दातार न हूवो । जिन कंचन बाहू उठाई । सोई कबीसा कवल न बेडी । सायर जिसी तलाई । लंक सरीखो कोट न देख्यो । समंद सरीखी खाई । दशरथ सो कोइ पिता न देखो । देवल देसी माई । सीत सरीखी तिरिया न देखि । गरब न करीयों काई । हनमत सो कोई राव न देख्यो जिन चोहचक आन फिराई । एक तिरिया कै राहा बेधी । लंका फेर बसाई । संखा मोहरा सेतम सेतूं । ताक्यूं बिलगै काई । ब्राम्हण था ते वेदे भूला । काजी कलम गुमाई । जोग बिहूंणा जोगी भुला । मुंडिया अकल न काई । यह कलयुग में दोय जन भुला । एक पिता एक माई । बाप जाणै मेरै बहूटल आवै । बाजै बिरद बधाई । म्हे शंभू का फरमाया आया । बैठा तखत रचाई । दोय भुजडंडे परबत तोलां । फेंरा आपण राई । एक पलक मैं सर्व संतोषां । जीया जूण सवाई । जुगां २ को जोगी आयो । बैठा आसन धारी । हाली पूछै पाली पूछै । यह कलि पूछण हारी । थली फिरंतो खिलेरी पूछै । मेरी गुमाई छाली । बांण चहोड पार धीयो पूछै । किहिं अवगुण चूकै चोट हमारी । रहोरे मुर्खा मुग्ध गवारा । करो मजूरी पेट भराई । है है जायो जीव न घाई । मैडि बैठो राजेन्द्र पूछै ठाकर पूछै और पूछै कीर कहारी । सोक दुहागण तेपण पूछे ले ले हाथ सुपारी । बांझ तिरिया बहुतेरी पूछै । किसी परापति म्हारी । त्रेतायुग में हीरा बिणज्या । द्वापर गऊ चराई।व्रुन्दावन में बंशी बजाई कलयुग चारी छाली।नव खेडी म्हें आगे खेडी । दशवें कालंके की बारी । उत्तम देश पसारो मांड्यो । रमण जुवारी । एक खंड बैठा नवखंड जीता को ऐसो लहो जुवारी। एक खंड बैठा नवखंड जीता । को ऐसो लहो जुवारी॥८५॥

    शब्द 86

    ओ३म् जुग जागो जुगजाव पिरांणी । कांय जागता सोवो । भलकै बीर बिगोवो होसी । दुश्मन कांय लकोवो । लेकूंची दरवान बुलावो । दिल ताला दिल खोवो । जंपोरे जिण जंप्यो जणीयर् । जपसी सो जिण हारी । लह २ दाव पडता खेलो । सुर तेतींसा सारी । पवन बंधान काया गढकाची । नीर छ्लै ज्यूँ पारी । पारी बिनसै नीर ढलैलो । ओपिंड काम न कारी । काची काया द्रुढ कर सीचो । ज्यूँ ईधन की भारी । शील स्नाने संजमे चालो । पाणी देह पखाली । गुरु के बचने निव खिव चालो । हाथ जपो जपमाली । वस्तु पियारी खरचो क्यू नाही । किहिं गुण राखो टाली । खरचे लोहो राखे टोटो । बिबरस जोय निहाली । घर आगी इत गोवल बासो । कूडी आधो चारी । आज मूवा कल दूसर दिन है । जो कुछ सरै तो सारी।पीछै कलीयर कागा रोलो । रहसी कूक पुकारी । ताण थकै क्यू हरियो नाहीं । मुरखा अवसर जो लैहारी॥८६॥

    शब्द 87

    ओ३म् जाका उमग्या समाघूं । तिहिं पंथ के बिरला लागूं । बीजा चाकर बीरु । रण शंख धीरु । कबही झूझत रायूँ । पासै भाजत भायों । तातैं नुगरा—न कायो॥८७॥

    शब्द 88

    ओ३म् गोरखे लो गोपाल लो । लाल गवाल लो । लाल लीलंग देवों । नवखंड प्रुथिवी प्रगटियो । कोई बिरला जाणत हमारी । आद मूल का भेवों॥८८॥

    शब्द 89

    ओ३म् उरधक चन्दा निव्दक सूरु । नव लाख तारा नेडा न दूरु । नव लख चन्दा नव लाख सुरु़ । नव लाख धंधू कारु । ताह पररै तेपण होता । ताका करुं बिचारु॥८९॥

    शब्द 90

    ओ३म् चोईस चेडा कालंग केडा । अधिक कलावंत आयसैं । वैफेर आसन मुकर होय बसैंला । नुगरा थान रचायसैं । जाणत –ला महा पापी।बहू दुनियां भोलायसैं । दिल का कूडा कुडियरा । उपंगवात चलाय सैं । गुरु गहाणा जो लेवै नाही । दश बंध घर बोसायसै । आप थापी महापापी । दरधी परलै जायसै । सतगुरुकै बैडै न चढै । गुरुस्वामी नै भायसैं । मंत्र बेलू अध सिध कर सै । दे दे कार चलायसै । काठ का घोडा निरजीवता । सरजीव कर सै । तानै दाल चरायसैं । अधर आसन मांड बसैला । मूवा मडा हसाय सै । जां जां पवन आसन् । सुरु आसन गुरु आसन संभरा थले । कहै सतगुरु भूलमत जाईयो । पडोला अभै दोजखे॥९०॥

    शब्द 91

    ओ३म् छंदे मंदे बालक बुध्दे । कूडे कपटे ऋध्द न सिध्दे । मेरे गुरु जो दीन्हीं शिक्षा । सर्व अलिड गण फेरी दीक्षा । जाण अजाण बहीर्या जब जब् । सर्व अलिड गण मेटे तब तब् । ममता हस्ती बांध्या काल् । काल पर काले परसत डाल् । ध्यान न डोलै मन न ट्लै । अहनिश ब्रह्म ज्ञान उच्चैर् । काया पत नगरी मन पत राजा । पंच आतमा परिवारुं । है को आछै मही मंडल शूरा । मन्राय सूं झूझ रचायले । अथगा थगायले । अबसा बसायले । अनबे माघ पाल ले।सत २ भाषत गुरु रायों । जरा मरण भो भागूं॥९१॥

    शब्द 92

    ओ३म् काया कोट पवन कुट वाली । कुकर्म कुलफ बनायो । माया जाल भरम का संकल् । बहु जग रहिया छायों । पढ वेद कुराणं कुमाया जालों । दंत कथा जग छायों । सिध साधक को एक मतो । जिन जीवत मुक्त द्रुढायों । जुगां जुगा को जोगी आयो । सतगुरु सिध्द बतायो । सहज स्नानी केवल ज्ञानी । ब्रम्हज्ञानी । सुकृत अहल्यो न जाई । क्यूं क्यूं सुणता । समझ बिना कुछ सिध्दी न पाई॥९२॥

    शब्द 93

    ओ३म् आद शब्द अनाहद बाणी । चोदह भवन रहा छल पाणी । जिहिं पाणी से अंड ऊपना । उपना ब्रह्मा इंद्र मुरारी॥९३॥

    शब्द 94

    ओ३म् सहस्त्र नाम सांई भल शंभु।म्हे उपना आद मुरारी।जद मैं रह्यो निरांभर हो कर्।उतपति धंधु कारी।ना मेरै मायन ना मेरै बापन । मैं अपनी काया आप सवारी । जुग छ्तीसों शून्यहि बर्ता।सतजुग माहीं सिरजी सारी।ब्रह्मा इन्द्र सकल जग थरप्या।दिन्हिं करामात केतीवारी।चन्द सूर दोय साक्षी थरप्या।पवन पवनेश्वर पवन अधारी।तदम्हे रुप कीयो मनावतीयो।सत्यव्रत को ज्ञान उचारी।तदम्हे रुप रच्यो काम्ठीयो।तेतीसों की कोड हंकारी।जब मैं रुप धरयो बारा ही प्रुथिवी दाढ चढाई सारी।नरसिंह रुप धर हिरण्यकश्यप मारयो।प्रहलादो रहियो शरण हमारी।बावन होय बलिराज चितायो।तीन पैंड कीवी ध्ररसारी।परशुराम हो क्षत्रियपन साध्यो।गर्भ न छूटो नारी।श्रीराम शिरमुकुट बंधायो।सिता के अहंकारी।कन्हड होय कर बंसी बजाई गऊ चराई।धरती छेदी काली नाथ्यो।असुर मार किया क्षायकारी।बुध्द रुप गया सुर मारयो।काफर मार किया बेगारी।पंथ चलायो राह दिखायो।नौबर विजय हुई हमारी।शेष जंभराय आप अपर पर्।अवल दीन से कहियो।जांभा गोरख गुरु अपारा।काजी मुल्ला पढिया पंडित।निंदा करै गवारा।दोजख छोड भिस्त जे चाहो।तो कहिया करो हमारा।इन्द्रपुरी बैकुण्ठ बासो।तो पावो मोक्षाहिं द्वारा॥९४॥

    शब्द 95

    ओ३म् बाद बिवाद फिटाकर प्राणी।छाडो मनहठ मन का भाणो।काही कै मन भयो अंधेरो।काही सूर उगाणो।नुगरा कै मन भयो अंधेरो।सुगरा सूर उगाणो।चरणभि रहिया लोय न झुरिया।पिंजर पुराणां।बेटा बेटी बहनर भाई सबसै भयो अभाणो।तेल लियो खल चोपे जोगी।रीता रहियो वाणो हंस उडाणो पंथ बिलंब्यो।कियो दूर पयाणो।आगै सुरपति लेखो मांगै।कही जिवडा क्या करम कमाणो।जीवडानै पाछो सूझन लागो।सुकृत नै पछतानो॥९५॥

    शब्द 96

    ओ३म् सुण गुणवंता।सुण बुधवंता।मेरी उत्पत्ति आद लुहारुं।भाठी अन्दर लोह तपीलो।तंतक सोना घडै कसारुं मेरी मनसा अहरण नाद हतोडा।शशीयर सूर तपीलो।पवन अधारी खालूं।जेथे गुरु का शब्द मानीलो।लंघिबा भव जल पारुं।आसन छाड सुखासन बैठो।जुग २ जीवै जंभ लुहारुं।।९६॥तपीलो।तंतक सोना घडै कसारु मेरी मनसा अहरण नाद हथोडा।शशीयर सूर तपीलो।पवन अधारी खालूं।जेथे गुरु का शब्द मानीलो।लंघिबा भव जल पारु।आसन छाड सुखासन बैठो।जुग २ जीवै जंभ लूहारु॥९६॥

    शब्द 97

    ओ३म् विष्णु २ तू भण रे प्राणी।जो मन मानै रे भाई।दिन का भूला रात न चेता।कायं पडा सूता। आस किसी मन थई।तेरी कुड काची लगवाड घणो छै।कुशल किसी मन भाई।हिरदै नाम विष्णु को जंपो।हाथै करो टवाई।हरि पर हर की आण न मानी भुलाभुल जपी महमाई।पाहन प्रीत फिटा कर प्राणी।गुरु बिन मुक्त न जाई।पंच क्रोडी ले प्रहलाद उतरियों।जिन खर तर करी कमाई।सात क्रोडी ले राजा हरिचंद उतरियो।तारदे रोहिताश हरिचंद हाटोहाट बिकाई।नव क्रोडी राव युधिष्ठिर ले उतरियो।धन २ कुनती माई।बारा क्रोड समाहन आयो।प्रहलाद सूं कवलजु थाई।किसकी नारी बस्त पियारी।किसका बहिनरु भाई।भूली दुनिया मर मर जवै।ना चीन्हों सुरराई।पाहण नाऊं लोहा सक्ता। नुगरा चीन्हत काई॥९७॥

    शब्द 98

    ओ३म् जिही गुरु कै खिणही पाणी।खिणही मेघ मंडाणो।क्रुष्ण करता बार न होई।थल सिर नीर निवाणो।भूला प्राणी विष्णु जपो रे।ज्यूँ मौत टलै जिरवाणो।भीगा है पण भेद्या नाही।पाणी माह पखाणो।जीवत मरो रे जीवत मरो।जिन जीवन की बिध जाणी।जे कोई आवै हो हो कर्।आप जै हुइयै पाणी।जाकै बहुती नवणी बहुती खवणी बहुती क्रिया समाणी।जाकी तो निज निर्मल काया।जोय जोय देखो लेख चढिया असमानी।यह मढ देवल मूल न जोयबा।निज कर जपो पिराणी । अनन्त रुप जोवो अभ्यागत । जिहिंका खोज लहो सुर बाणी । सेतम सेतूं।जेरज जेरु । इंडस इडू । अयालो उरध जै खैणी॥९८॥

    शब्द 99

    औ३म साच सही मे कूड़ न कहबा| नेडा था पर दूर न रहीबा|| सदा संतोषी सत उप कारण| म्हे ताज़िया मान भी मानु|| बस कर पवना बस कर पानी| बस कर हाट पटन दरवाज़ों|| दशे दवारे ताला जडिया| जो ऐसा उसतजो|| दशे दवारे ताला कुंची|भीतर पॉल बनाई|| जो आराध्यो राव युधिश्थर| सो आराधो रे भाई|| जिन्ही गर्के झुरैन झुरबा खिरै न खिरना| बंक त्रुबन्के|| नाल पै नालै| नैने नीर न झुरबा|| बिन पुल बंध्या बाणों| तजया आलिंगन तोड़ी माया|| टन लोचन गुण बाणों| हलिलो भाल पलिलो सिंधपालिलो|| खेड़त सुना रानों||९९||

    शब्द 100

    ओ३म् अर्थू साहण थाटूं।कुडा दीठो ना ठाटों।कूडी माया जाल न भूलीरो राजेन्द्र अलगी रहीओजूं की बाटों।नवलख दंताला बार करीलो।बार करे कर बंद करीलो।बंद करे करदान करीलो।दान करे कर मन फूलीलो।तंत मंत बीर बेताल करीलो।खायबा खाज अखाजूं।निरह निरंजन नर निर हारी।तऊ न मिलबा झंझा भाग अभांगूं॥१००॥

    शब्द 101

    ओ३म् नितही मावस नित संकरांति।नितहि गंग हिलोले जाय्।सतगुरु चीन्है सहजै न्हाय्।निरमल पाणी निरमल घाट्।जेयो धोबी जणै धोय्।घर में मैला वस्त्र रहै न कोय्।एक मन एक चित साबण लावै।पहरंतो गाहक अति सुख पावै।ऊंचे नीचे करै पसारा।नाहीं दूजै का संचारा।तिल में तेल पहुप में बास्।पांच तत्त्व में लियो प्रकाश्।बिजली कै चमक आवै जाय्।सहज शून्य में रहै समाय्।नैंयो गावै न यो गवावै।स्वर्गे जाते बार न लावै।सतगुरु ऐसा तत्त्व बतावैं।जुग जुग जीवै बहुर न आवें। ॥१०१॥

    शब्द 102

    ओ३म् विष्णु २ भण अजर जरीजै।धर्म हुवे पापां छूटीजै।हरि पर हरि को नाम जपीजै।हरीयालो हरि आण हरुं।हरि नारायण देव नरुं।आशा सास निरास भईलो।पाईलो मोक्ष दवार खिणूं॥१०२॥

    शब्द 103

    ओ३म् देखा अदेख्या सुणा असुणा।क्षिमारुप तप कीजै।थोडै माहिं थोडेरो दीजै।होते नाहिं न कीजै।क्रुष्ण मया तिहूं लोका साक्षी।अम्रुत फूल फलीजै।जोय जोय नाम विष्णु के दीजै।अनन्त गुणा लिख लीजै॥१०३॥

    शब्द 104

    ओ३म् कंचन दानो कुछ न मानू।कापड दानू कुछ न मानू।चोपड दानू कुछ न मानू।पाट पटंबर दानू कुछ न मानू।पंच लाख तुरंगम दानू कुछ न मानू।हस्ती दानू कुछ न मानू।तिरिया दानू कुछ न मानू।मानू ण्क सुचील सनानू॥१०४॥

    शब्द 105

    ओ३म् आप अलेख उपन्ना शंभू।निरह निरंजन धंघू कारुं।आपे आप हुआ अपरंपर्।नै तद चन्दा नै तद्सूरुं।पवण न पाणी धरती आकाश न थीयों।नातद मास न वर्ष न घडी न पहरुं । धूप न छाया तावन सीयों।न त्रीलोक न तारा मंडल मेघ न माला वर्षा थीयों।न तद जोग नक्षत्र तिथि न बार्सीयों। नातद चवदश पूनों मावसीयों।नैं तद समदन सागर न गिरि न पर्वत्।ना धोलागिर मेर थीयों।नातद हाट न बाट न कोट न कसबा।बिण ज न बाखर लाभ थीयों। यह छत धार बडे सुलतानो।रावण राणा ये दिबाणा हिंदू मूसलमानु।दोय पंथ नाहीं जूवा।नातद कामन कर्सन जोगन दर्शन्।तीर्थ बासी ये मसवासी।ना तद होता जपिया तपिया।न खच्चर हीबर बाज थीयों।नातद शूर न बीर न खडग न क्षत्री।रण संग्राम न जूझ न थीयों।माय न बाप न बहण न भाई।नातद होता पूत धीयों।सास न श्ब्दूं जीव न पिंडूं।नातद होता पुरुष त्रियों।पाप न पुण्य न सती कुसती।नातद होती मया न दया।आपै आप ऊपना शम्भू।निरह निरंजन धन्धू कारुं।आपो आप हुआ अपरंपर्।हे राजेंन्द्र लेह बिचारुं ॥१०५॥

    शब्द 106

    ओ३म् सुणरे मुल्ला।सुनियो लोग लुगाई।नर निरहारी एक लवाई।जिनयोरा फरमाई।जोर जरब करद जे छाडो।ता कलमा नाम खुदाई।जिनकै साच सिदक इमान सलामत्।जिनयो भिस्त उपाई॥१०६॥

    शब्द 107

    ओ३म् सहजे शीले सेज बिछायों।उनमन रहां उदासूं।जुगे जुगन्तर भवे भवन्तर्।कहों।कहाणीं कासूं।रवी ऊगा जब उल्लू अन्धा।दुनियां भया उजासूं।सतगुरु मिलियो सतपंथ बतायो भ्रांत चुकाई।सुगरां भयो बिसवासू।जां जां जाण्यो तहां प्रवाणो।सहज समाणो।जिहि के मन की पूगी आसूं।जहां गुरु न चीन्हों पंथ न पायो।तहां गल पडी परासू॥१०७॥

    शब्द 108

    ओ३म् हालीलो भल पालीलो सिध पालीलो।खेडत सूना राणो।चन्द सूर दोय बैल रचीलो।गंग जमन दोय रासी।सत संतोष दोय बीज बीजीलो।खेती खडी अकासी।चेतन रावल पहरै बैठे।म्रुगा खेती चर नहीं जाई।गुरु प्रसादे केवल ज्ञाने।ब्रह्मज्ञाने सहज स्नाने।यह घर ऋध सिध पाई॥१०८॥

    शब्द 109

    ओ३म् देखत भूली को मन मानै।सेवै बिलावे बाझ सनानै।देखत भूली को मन चेवै।भीतर कोरा बाहर भेवै।देखत भूली को मन मानै।हरि पर हर मिलियो शैताने।देखत भूली को मन चेवै।आक बखांणैं थंदे मेवै।भूलालो।भूला भूल न भूलूं।जिहिं ठूंठडिये पान न होता।ते क्यूं चाहत फूलूँ॥१०९॥

    शब्द 110

    ओ३म् मथुरा नगर की राणी होती होती पाट्मदे राणां।तीरथ बासी जाती लूटे।अति लूटे खुरसाणी।मानक मोती हीरा लूटा।जाय बीलूधा दाणी।कवले चूकी बचने हारी।जिहिं औगुण ढांची पाणी।विष्णु कूँ दोष किसोरे प्राणी।आपे खता कमाणी॥११०॥

    शब्द 111

    ओ३म् खरड अढीजै तूंबा जीमीजै सुरहै ढुहीजै।कृत खेत कि सीव मलीजै।पीजै ऊंडा नीरुं।सुर नर देवां बंदी खानै।तित उतरीया तीरुं।भोलभ भालभ्।टोलम टालम ज्यूं जाणो त्यू आणो।मैं बाचा दई प्रहलाद सूँ सूचैलो गुरु लाजै।क्रोड तेतीसूं बाडै दीन्हीं।तिनकी जात पिछाणो॥१११॥

    शब्द 112

    ओ३म् जके पंथ का भांजणा।गुरु का नींदणा स्वामी का दुस्मणा।कुफर ते काफरा।कुमली कुपातूँ कुचिला कुधातूं।हड हडा भड हडा।दानबे दूतबा दानबे भूतबां।राकसा बोकसा।जाका जन्म नहीं पर कर्म चंडालूँ।और कूं जिभे कर आप कूं पोषणा।जिहिंकी रवा ले दिजैसि।दौरे घूंप अंधारौं।तान बे तानबा।छान बे छानबा।तोड बे तोडबा।कूक बे पुकारबा।जाकी कोई न करबा सारुं॥११२॥

    शब्द 113

    ओ३म् ईमा मोमन चीमा गोयम्।महंमद फुरमानी।उरका नमाज फरीजां।खासा खब्रर बिनाणी।इला रास्ती ईमा मोमन मारफत मुल्लाणी॥११३॥

    शब्द 114

    ओ३म् सुर नर तणो सन्देसो आयो।सांभलीयो रे जाटो।चांदन थकै अंधेरै क्यों चालो।भूल गया गुरु बाटो।नीर थकै घट थूल क्यूं राखो।सबल बिगोवो खाटो।मागर मनियां क्यूं हाथ बिसाहो।कांय हीरा हाथ उसाटो।सुर नर तणो संदेशो आयो.।सांभलियो रे जाटो॥११४॥

    शब्द 115

    ओ३म् म्है आप गरीबी तन गूदडियो । मेरा कारण किरीया देखो।बिन्दो ब्योहरो ब्योर बिचारो । भूलस नाहीं।लेखो। नदिये नीरुं सागर हीरुं । पवणा रुप फिरै परमेश्वर । बिंबे बेला निश्चल थाघ अथाघूं । उमग्या समाघूं । ते सरवर कित नीरुं।गहर गंभीरुं । खिण एक सिन्धपुरी विश्राम लियों । अब जु मंडल भई अवाज्यूँ । म्हे सून्य मंडल का राजूं। ॥११५॥

    शब्द 116

    ओ३म् आयसां म्रुगछाला पावोडी काय फिरावो । मतूँ त आयसां ऊगंतो भाण थंभाऊं । दोनों परबत मेर उजागर । मतूंत अर्धाबच आन भिडाऊ । तीन भुवन कि राही रुक्मण् । मतूँ त थल सिर आण बसाऊ । नवसै नदी नवासी नाला । मतूं तो थल सिर आन बहाऊं।सीत बहोडी लंका तोडी।ऐसो कियो संग्रामो । जां बाणै म्हे राण मारयो । मतूं तो आयसां गढ हथनापुर सै आन दिखाऊं । जो तू सोने की म्रुगी कर चलावै । मतूं त घन पाहण बरसाऊं । म्रुगछाला पावोडी कांय फिरावो।मतूतो उगंतो भाण थंभाऊं॥११६॥

    शब्द 117

    ओ३म् टूका पाया मगर मचाया।ज्यूं हंडिया का कुत्ता।जोग जुगत की सार न जाणी।मुंड मुंडाय बिगूता।चेला गुरु अपरचै खीणा।मरते मोक्ष न पायों॥११७॥

    शब्द 118

    ओ३म् स्वर्गा हूंते शंभू आयों । कहो कौन के काजै । नर निरहारी एक लवाई । परगट जोत विराजै । प्रहलाद सूं वाचा कीवी।आयो बारां काजै । बारा में सूँ एक घटै तो । सूचेलो गुरु लाजै॥११८॥

    शब्द 119

    ओ३म् विष्णु २ तू भणरे प्राणी । पैकै लाख उपाजूं । रतनकाया बैकुंठ्वासो तेरा जरा-मरण भयभाजूं। ॥११९॥

    शब्द 120

    ओ३म् विष्णु २ तू भण रे प्राणी । इस जीवन कै आवै।क्षण २ आव घटंती जावै । मरण दिनों दिन आवै । पालटीयो घट कांय न चेत्यो । घातीरोल भनावै । गुरु मुख मुरखा चढै न पोहण् । सुमनख भार उठावै । ज्यूं ज्यूं लाज दुनी की लाजै । त्यूं त्यूं दाब्यो दावै । भलिया होय सो भली बुध आवै । बुरियाबुरी कमावै। ॥१२०॥*

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    Bhavesh Bishnoi
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